भारत में पारम्परिक चिकित्सा पर वैश्विक विमर्श: संभावनाएँ, प्रमाण और भविष्य की राह
| गणपत चौहान छत्तीसगढ़
नई दिल्ली |
भारत की राजधानी नई दिल्ली में पारम्परिक चिकित्सा पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों—मंत्रियों, वैज्ञानिकों, आदिवासी नेताओं और चिकित्सकों—ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्देश्य पारम्परिक चिकित्सा की संभावनाओं, प्रामाणिकता, सुलभता और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकरण पर ठोस वैश्विक सहमति बनाना था।
पारम्परिक चिकित्सा: वैश्विक स्वास्थ्य का आधार
पारम्परिक चिकित्सा में वे संहिताबद्ध व असंहिताबद्ध पद्धतियाँ शामिल हैं जो आधुनिक जैव-चिकित्सा से पहले अस्तित्व में थीं और समय के साथ विकसित होती रहीं। आज भी दुनिया के अनेक समुदायों के लिए यह उपचार का मुख्य सहारा है—क्योंकि यह स्थानीय रूप से उपलब्ध, किफ़ायती और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य है।
WHO के अनुसार, उसके लगभग 90% सदस्य देशों (194 में से 170) में 40–90% आबादी किसी न किसी रूप में पारम्परिक चिकित्सा का उपयोग करती है।
नेतृत्व का संदेश: विज्ञान और परंपरा का संगम
WHO के महानिदेशक डॉ. टैड्रॉस ऐडहेनॉम घेबरेयेसस ने उद्घाटन सत्र में वीडियो संदेश के माध्यम से कहा कि संस्था हज़ारों वर्षों के ज्ञान को आधुनिक विज्ञान व प्रौद्योगिकी—जैसे एआई और जीनोमिक्स—के साथ जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लक्ष्य साकार हों।
उन्होंने ज़िम्मेदारी, नैतिकता और समानता पर ज़ोर देते हुए पारम्परिक चिकित्सा की उस क्षमता को रेखांकित किया जो सुरक्षित, प्रभावी और टिकाऊ समाधान दे सकती है।
स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकरण: आवश्यकता क्यों?
दुनिया की स्वास्थ्य प्रणालियाँ अभूतपूर्व दबाव में हैं—लगभग 4.6 अरब लोग आवश्यक सेवाओं से वंचित हैं और 2 अरब से अधिक लोगों को आर्थिक बाधाओं के कारण इलाज में कठिनाई होती है।
WHO के मुताबिक, पारम्परिक चिकित्सा का एकीकरण:
- किफ़ायती व जन-केन्द्रित उपचार तक पहुँच बढ़ाता है
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) को मज़बूत करता है
- रोकथाम और स्वास्थ्य संवर्धन से दीर्घकालिक सार्वजनिक लाभ देता है
- एंटीबायोटिक के संतुलित उपयोग में मदद करता है
उभरते साक्ष्य बताते हैं कि सही ढंग से लागू होने पर यह ख़र्च घटाने और स्वास्थ्य परिणाम बेहतर करने में सहायक है।
मानक, सुरक्षा और विनियमन: भरोसे की नींव
हालाँकि, प्रभावी एकीकरण के लिए मज़बूत वैज्ञानिक साक्ष्य, गुणवत्ता व सुरक्षा के वैश्विक मानक और प्रभावी नियम-क़ानून अनिवार्य हैं। WHO की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सिल्वी ब्रियांद ने कहा कि पारम्परिक औषधियों के मूल्यांकन में जैव-चिकित्सा जैसी वैज्ञानिक कठोरता लागू करनी होगी, साथ ही जैव-विविधता, सांस्कृतिक विशिष्टताओं और नैतिक सिद्धांतों का सम्मान भी ज़रूरी है।
नवाचार, निवेश और सततता
पारम्परिक चिकित्सा—विशेषकर जड़ी-बूटी आधारित औषधियाँ—तेज़ी से बढ़ते वैश्विक उद्योगों का आधार हैं। WHO के अनुसार, पारम्परिक नुस्ख़ों और जैव-चिकित्सकीय दवाओं का आधे से अधिक हिस्सा प्राकृतिक संसाधनों से आता है।
यहाँ आदिवासी समुदायों की भूमिका केंद्रीय है: वे वैश्विक आबादी का लगभग 6% हैं, फिर भी दुनिया की करीब 40% जैव-विविधता की रक्षा करते हैं। इसलिए:
- आदिवासी अधिकार, निष्पक्ष व्यापार और लाभ-साझेदारी
- सतत संसाधन उपयोग
—इन पर विशेष ध्यान आवश्यक है।
इसके बावजूद, वैश्विक स्वास्थ्य अनुसंधान निधि का 1% से भी कम हिस्सा पारम्परिक चिकित्सा को मिलता है, जिससे साक्ष्यों और नवाचार में अंतर बना हुआ है।
ज्ञान का वैश्विक भंडार: पारम्परिक चिकित्सा वैश्विक पुस्तकालय
इस खाई को पाटने के लिए WHO ने ‘पारम्परिक चिकित्सा वैश्विक पुस्तकालय’ की घोषणा की—जिसमें 16 लाख+ वैज्ञानिक अभिलेख (अनुसंधान, नीतियाँ, विनियम, विषयगत संग्रह) शामिल हैं।
यह पहल G20 और BRICS बैठकों के दौरान राष्ट्राध्यक्षों की अपील के बाद विकसित हुई। Research4Life के तहत यह कम-आय वाले देशों को सहकर्मी-समीक्षित सामग्री तक समान ऑनलाइन पहुँच देगा और बौद्धिक संपदा संरक्षण के साथ दस्तावेज़ीकरण व वैज्ञानिक क्षमता निर्माण में मदद करेगा।
WHO के वैश्विक पारम्परिक चिकित्सा केंद्र की कार्यवाहक निदेशक डॉ. श्यामा कुरुविल्ला ने इसे साक्ष्य-आधारित, नैतिक और पर्यावरणीय अनिवार्यता बताया।
भारत की भूमिका और वैश्विक महत्व
भारत, जहाँ आयुष सहित समृद्ध पारम्परिक चिकित्सा परंपराएँ हैं, इस वैश्विक विमर्श का स्वाभाविक केंद्र बनकर उभरा है। नई दिल्ली में हुआ यह शिखर सम्मेलन न केवल नीति-निर्माण को दिशा देता है, बल्कि विज्ञान–परंपरा के संगम को संस्थागत रूप देता है।

