गौरव कोचर
नई दिल्ली, 31 मई 2026: भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ती रणनीतिक और सैन्य भागीदारी को और मजबूत करने के लिए 1 जून 2026 को नई दिल्ली में एक उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन होने जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ऑस्ट्रेलिया के उप प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स इस दूसरे ‘भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा मंत्रियों के संवाद’ की सह-अध्यक्षता करेंगे।
इस महत्वपूर्ण बैठक में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रक्षा सहयोग में अब तक हुई प्रगति की विस्तृत समीक्षा की जाएगी, साथ ही रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए सहयोग के नए रास्ते तलाशे जाएंगे।
संवाद के मुख्य एजेंडे और रणनीतिक बिंदु
इस द्विपक्षीय बैठक में हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र की सुरक्षा सहित कई गंभीर और रणनीतिक मुद्दों पर गहन चर्चा होगी। बैठक के मुख्य एजेंडे निम्नलिखित हैं:
- सैन्य अंतर-संचालनीयता (Interoperability): दोनों देशों की सेनाओं के बीच संयुक्त अभ्यासों और तकनीकी तालमेल को और उन्नत बनाना।
- रक्षा उद्योग में सह-उत्पादन: रक्षा क्षेत्र में केवल खरीद-बिक्री तक सीमित न रहकर, अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों के सह-विकास (Co-development) और सह-उत्पादन (Co-production) के अवसरों को बढ़ाना।
- क्षेत्रीय एवं वैश्विक सुरक्षा: पारस्परिक हित से जुड़े क्षेत्रीय सुरक्षा घटनाक्रमों और वैश्विक चुनौतियों पर साझा रणनीति तैयार करना।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता पर केंद्रित दृष्टिकोण
यह बैठक दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को और प्रगाढ़ करने के साथ-साथ रणनीतिक विश्वास को बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होगी। भारत के एक स्वतंत्र, खुले, समावेशी और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दृष्टिकोण में ऑस्ट्रेलिया एक बेहद महत्वपूर्ण और भरोसेमंद भागीदार है। इस संवाद से इस पूरे क्षेत्र में स्थिरता, शांति और सुरक्षा को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
व्यापक रणनीतिक साझेदारी में तेजी:
रिचर्ड मार्ल्स की यह भारत यात्रा अक्टूबर 2025 में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित हुए पहले रक्षा मंत्रियों के संवाद के बाद हो रही है। इतनी कम अवधि में दूसरा संवाद होना भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी (Comprehensive Strategic Partnership) की बढ़ती गहराई, परिपक्वता और दोनों देशों के बीच मजबूत होते विश्वास को रेखांकित करता है।
भविष्य के नए रास्ते
इस यात्रा के माध्यम से रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग के कुछ नए क्षेत्रों की पहचान भी की जाएगी, जिससे दोनों देशों की सेनाएं भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक सक्षम हो सकेंगी। इस ऐतिहासिक बैठक पर न केवल दोनों देशों की बल्कि पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं।