नई दिल्ली/ प्रीति बालानी/ भारत का भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI) पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से देश की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और आधुनिक आर्थिक अवसरों के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में उभर रहा है। स्थानीय कारीगरों, किसानों और उत्पादकों को सशक्त बनाने के साथ-साथ यह पहल भारतीय विरासत की सुरक्षा और स्थायी आर्थिक मूल्य के निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभा रही है।
हालिया पहलों और वैश्विक सहभागिता के बल पर, भारत ने अब वर्ष 2030 तक 10,000 जीआई उत्पाद पंजीकृत करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है।
स्थानीय से वैश्विक: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय जीआई उत्पाद
भारत के अनूठे क्षेत्रीय उत्पादों की पहुंच केवल घरेलू बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इन्हें वैश्विक मंचों पर भी बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। विदेशों में आयोजित होने वाले प्रमुख व्यापार मेलों और प्रदर्शनियों में भारतीय जीआई उत्पादों का लाइव प्रदर्शन किया जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का ध्यान इन पर केंद्रित हुआ है।
हाल ही में इसके प्रमुख उदाहरण देखने को मिले:
- ऑटम फेयर इंटरनेशनल 2024 (बर्मिंघम, ब्रिटेन): यूके के इस प्रतिष्ठित मेले में भारतीय जीआई शिल्प और कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई गई।
- बाजार बर्लिन 2024 (जर्मनी): जर्मनी के प्रसिद्ध बाजार में भारत के अनूठे क्षेत्रीय उत्पादों का लाइव प्रदर्शन किया गया, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहना मिली।
विरासत अर्थव्यवस्था (Heritage Economy) को मजबूती
जीआई टैग केवल किसी उत्पाद की पहचान नहीं है, बल्कि यह उत्पादकों के लिए आर्थिक समृद्धि का एक माध्यम है।
मुख्य लाभ:
- विरासत का संरक्षण: पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक तकनीकों और उत्पादों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना।
- बाजार विस्तार: घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक सीधी पहुंच सुनिश्चित करना।
- उत्पादकों का सशक्तिकरण: बिचौलियों को हटाकर स्थानीय कारीगरों और किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य दिलाना।
आगे का रास्ता: एक समृद्ध भविष्य की ओर
इन निरंतर प्रयासों से यह सुनिश्चित हो रहा है कि भारत की अनूठी क्षेत्रीय विशेषताएं आने वाली पीढ़ियों तक फलती-फूलती रहें। 10,000 जीआई पंजीकरण के विशाल लक्ष्य के साथ, भारत अपनी ‘हेरिटेज इकोनॉमी’ (विरासत अर्थव्यवस्था) को और अधिक मजबूत करने तथा विश्व पटल पर अपनी मौजूदगी को और अधिक सशक्त बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार है।