नई दिल्ली/ प्रीति बालानी/भारतीय रेलवे ने पर्यावरण-अनुकूल परिवहन (सस्टेनेबल मोबिलिटी) की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चलने वाली ट्रेनसेट का सफल विकास कर लिया है। यह परियोजना न केवल भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता को दर्शाती है, बल्कि राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और देश के दीर्घकालिक ‘नेट जीरो’ (शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन) लक्ष्य को हासिल करने में भी एक मील का पत्थर साबित होगी।
स्वदेशी तकनीक और मजबूत क्षमता का निर्माण
इस अत्याधुनिक हाइड्रोजन ट्रेन को पूरी तरह से भारत में ही डिजाइन, इंजीनियर और एकीकृत (इंटीग्रेट) किया गया है। इसके विकास में विभिन्न भारतीय संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है:
- आरडीएसओ (RDSO): तकनीकी विशिष्टताओं को तैयार करने और डिजाइन अनुमोदन प्रक्रिया का नेतृत्व रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन ने किया।
- मेधा सर्वो ड्राइव्स (M/s Medha Servo Drives): ट्रेनसेट के विभिन्न तकनीकी हिस्सों और प्रणालियों को आपस में जोड़ने (इंटीग्रेशन) का कार्य इनके द्वारा किया गया।
- इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF): चेन्नई स्थित इस फैक्ट्री ने ट्रेन की विशेष थीम और बाहरी आकर्षक डिजाइन (एक्सटीरियर) को तैयार किया।
संपूर्ण हाइड्रोजन इकोसिस्टम (जिंद)
सिर्फ ट्रेन ही नहीं, बल्कि भारतीय रेलवे ने हरियाणा के जिंद में देश की सबसे बड़ी रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग सुविधा स्थापित की है। इस पूरे इकोसिस्टम में इलेक्ट्रोलाइसिस के माध्यम से हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण, संपीड़न (कंप्रेशन) और वितरण अवसंरचना शामिल है, जो ट्रेनों के नियमित संचालन का आधार बनेगी।
त्वरित रिफ्यूलिंग और बेजोड़ क्षमता
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हाइड्रोजन से चलने वाली कारों की तरह ही इन ट्रेनों में भी बेहद कम समय (टर्नअराउंड टाइम) में ईंधन भरा जा सकता है। जिंद स्थित सुविधा में एक समय में लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन का भंडारण किया जा सकता है। यह मात्रा ट्रेनसेट के नियमित और निर्बाध संचालन को बनाए रखने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है।
सुरक्षा के वैश्विक मानक और ‘गहन सुरक्षा’ का सिद्धांत
हाइड्रोजन गैस प्राकृतिक रूप से रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन और गैर-विषैली होती है, लेकिन इसके अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी बरती गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत ‘गहन सुरक्षा’ (डिफेंस इन डेप्थ) के सिद्धांत पर काम करते हुए, सुरक्षा को हर स्तर पर समाहित किया गया है:
1. चौबीसों घंटे निगरानी और वेंटिलेशन
ट्रेन और संयंत्र में संवेदनशील उपकरण लगाए गए हैं जो कुछ ही सेकंड में हाइड्रोजन रिसाव, असामान्य गर्मी, आग की लपटों या धुएं का पता लगा लेते हैं। ट्रेन में निरंतर वेंटिलेशन (हवा का प्रवाह) की व्यवस्था है ताकि यदि मामूली रिसाव हो भी, तो हाइड्रोजन जमा होने के बजाय सुरक्षित रूप से खुली हवा में घुल जाए।
2. स्वचालित शट-ऑफ और पायलट सुरक्षा
किसी भी असामान्य स्थिति का पता चलते ही सिस्टम मानवीय प्रतिक्रिया का इंतजार किए बिना स्वचालित रूप से हाइड्रोजन की आपूर्ति बंद कर देता है। लोको पायलट के केबिन को विशेष रूप से सुरक्षित बनाया गया है, जिसमें एक डिस्प्ले स्क्रीन पूरे सिस्टम की वास्तविक स्थिति दिखाती है। आपात स्थिति के लिए इसमें एक विशेष मोड भी है, जो ट्रेन को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की अनुमति देता है।
3. स्वीकृतियां और स्वतंत्र मूल्यांकन
भंडारण और आपूर्ति प्रणाली को पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) द्वारा अनुमोदित किया गया है। इस प्रणाली का डिजाइन NFPA-2 और ISO 19880 जैसी अंतरराष्ट्रीय मानक श्रृंखलाओं के अनुरूप है। इसके अलावा, जर्मनी की प्रमुख तकनीकी निरीक्षण एजेंसी टीयूवी एसयूडी (TUV SUD) द्वारा इसका स्वतंत्र तृतीय-पक्ष सुरक्षा मूल्यांकन भी कराया गया है।
सेवा में उतरने से पहले कड़े परीक्षण
यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ट्रेन को कई कड़े तकनीकी परीक्षणों से गुजारा गया है:
- लोड बॉक्स परीक्षण: वास्तविक भार के तहत विद्युत और पावर प्रणालियों की कार्यप्रणाली जांची गई।
- रेडियो फ्रीक्वेंसी परीक्षण: यह सुनिश्चित किया गया कि ट्रेन के इलेक्ट्रॉनिक्स सिग्नलिंग और संचार प्रणालियों में बाधा न डालें।
- दोलन (ऑसिलेशन) परीक्षण: तेज गति में भी ट्रेन बिना किसी अत्यधिक कंपन के स्थिर और सुचारू रूप से चले, इसकी जांच की गई।
- आपातकालीन ब्रेक दूरी परीक्षण: आपातकालीन स्थिति में ट्रेन कितनी जल्दी और सुरक्षित दूरी पर रुक सकती है, इसका सत्यापन किया गया।
वैश्विक पटल पर भारत की मजबूत स्थिति
वर्तमान में हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक वैश्विक स्तर पर शुरुआती चरण में है। जर्मनी व्यावसायिक रूप से इसे शुरू करने वाला पहला देश है, जबकि फ्रांस, इटली, चीन और जापान जैसे देश सीमित या प्रायोगिक परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर ये ट्रेनें आमतौर पर दो से चार डिब्बों की होती हैं और क्षेत्रीय सेवाओं तक सीमित हैं।
इसकी तुलना में, भारत की हाइड्रोजन ट्रेन और जिंद में स्थापित विशाल रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पैमाने और महत्वाकांक्षा दोनों ही दृष्टि से वैश्विक स्तर पर एक बहुत बड़ी प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भविष्य की योजनाएं
जिंद-सोनीपत हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना से प्राप्त अनुभवों के आधार पर, भारतीय रेलवे अब देश के ऐतिहासिक और विरासत रेलमार्गों (हेरिटेज रूट्स) पर भी इस तकनीक को अपनाने की तैयारी कर रहा है, जिसमें प्रसिद्ध कालका-शिमला मार्ग भी शामिल है। यह पहल आने वाले समय में देश के भीतर हाइड्रोजन-संचालित रोलिंग स्टॉक के लिए एक बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रम का मार्ग प्रशस्त करेगी।