भारतमाला प्रोजेक्ट: सड़क निर्माण की आड़ में बेशकीमती पेड़ों का ‘रहस्यमयी’ सफाया, डीबीएल कंपनी पर गंभीर आरोप

गनपत चौहान 

रायगढ़/छाल। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना अब रायगढ़ जिले में भ्रष्टाचार और मनमानी का पर्याय बनती जा रही है। ताज़ा मामला धरमजयगढ़ वन मंडल के अंतर्गत सिसरिंगा घाट इलाके का है, जहाँ सड़क निर्माण का जिम्मा संभाल रही दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड (DBL) पर तय सीमा से अधिक वन भूमि कब्जाने और सैकड़ों बेशकीमती पेड़ों को गायब करने के संगीन आरोप लगे हैं।

अमृत सरोवर का अस्तित्व खतरे में, अब वन संपदा पर वार

​रायगढ़ जिले में भारतमाला सड़क निर्माण की शुरुआत से ही विवादों का साया रहा है। पहले मुआवजा वितरण में धांधली और कोल ब्लॉक एरिया की जमीन के अवैध अधिग्रहण के मामले सामने आए थे। इसके बाद अमृत सरोवर योजना के तहत बने तालाबों से अवैध मिट्टी उत्खनन कर उनका स्वरूप बिगाड़ने का कारनामा हुआ। अब कॉर्पोरेट और सिस्टम के कथित गठजोड़ ने सिसरिंगा घाट जैसे पर्यटन स्थल की प्राकृतिक सुंदरता को क्रूरता से चोट पहुँचाई है।

ग्रामीणों का दावा: सैकड़ों सागौन के पेड़ हुए ‘गायब’

​स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, दिलीप बिल्डकॉन कंपनी ने सड़क निर्माण के लिए निर्धारित सीमा का उल्लंघन करते हुए अतिरिक्त वन भूमि पर खुदाई शुरू कर दी। इस प्रक्रिया में वहां मौजूद सैकड़ों साल पुराने सागौन और अन्य बेशकीमती पेड़ों को मशीनों से जड़ समेत उखाड़ फेंका गया।

​ग्रामीणों ने बताया:

​”देखते ही देखते भारी मशीनों ने पेड़ों को समूल उखाड़ दिया। अब उन पेड़ों का कोई अता-पता नहीं है। मौके पर सिर्फ पेड़ों के अवशेष पड़े हैं, जबकि लकड़ी का मुख्य हिस्सा रहस्यमयी ढंग से गायब कर दिया गया है।”

 

​इसके अलावा, ग्रामीणों का आरोप है कि इस अवैध विस्तार से सरकारी जल स्रोतों और निजी संपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुँचा है।

वन विभाग के विरोधाभासी बोल: कटाई किसने की?

​इस पूरे प्रकरण में वन विभाग की भूमिका संदेह के घेरे में है। विभाग के दो रेंजरों के बयानों ने इस मामले को और उलझा दिया है:

  • धरमजयगढ़ रेंजर: इनका दावा है कि प्रस्ताव के आधार पर चिह्नित पेड़ों की कटाई की गई है।
  • उत्पादन इकाई रेंजर: इनका कहना है कि भारतमाला के लिए चिह्नित पेड़ों की कटाई सालों पहले ही पूरी की जा चुकी है। हाल के दिनों में विभाग द्वारा किसी भी पेड़ की कटाई नहीं की गई है।

​अधिकारियों के इन परस्पर विरोधी बयानों से यह स्पष्ट होता है कि या तो विभाग को जमीनी हकीकत का पता नहीं है, या फिर कंपनी की अवैध गतिविधियों को मौन स्वीकृति दी गई है।

प्रशासनिक चुप्पी पर उठते सवाल

​सरकारी सिस्टम की सतत निगरानी के दावों के बीच इतनी बड़ी मात्रा में वन संपदा की चोरी और भूमि अतिक्रमण होना प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है। पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित हो रहे सिसरिंगा घाट में इस तरह की ‘कार्पोरेट मनमानी’ ने पर्यावरणविदों और स्थानीय जनता में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।

​अब देखना यह होगा कि क्या जिला प्रशासन और वन विभाग के उच्च अधिकारी इस मामले की निष्पक्ष जांच करेंगे, या फिर विकास की आड़ में प्रकृति का यह ‘कत्लेआम’ यूँ ही जारी रहेगा।

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