ब्रह्म चतुर्दशी एवं बैकुंठ चतुर्दशी: सृष्टि के प्रादुर्भाव का प्रतीक, पुष्कर सरोवर में आस्था का संगम

ब्रह्म चतुर्दशी एवं बैकुंठ चतुर्दशी: सृष्टि के प्रादुर्भाव का प्रतीक, पुष्कर सरोवर में आस्था का संगम
(हरिप्रसाद शर्मा)
पुष्कर (अजमेर)। कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी के पावन अवसर पर इस वर्ष मंगलवार को सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत योग के साथ ब्रह्म चतुर्दशी एवं बैकुंठ चतुर्दशी का शुभ संयोग बन रहा है। यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है, बल्कि सृष्टि के प्रादुर्भाव और जगत के आरंभ का प्रतीक भी है।

वेद, पुराण और शास्त्रों में इस दिन का विशेष महत्व वर्णित है। पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, ब्रह्म चतुर्दशी के दिन 33 करोड़ देवी-देवता, ऋषि-मुनि, गंधर्व, किन्नर, संत-महंत और ब्राह्मणों ने मिलकर ब्रह्मा जी का अभिषेक पंचामृत, पंचगव्य, नदियों और समुद्रों के पवित्र जल से किया था। यही वह क्षण था जब सृष्टि की आधारशिला रखी गई।

पुष्कर सरोवर का प्रादुर्भाव

पंडित कैलाश नाथ दाधीच ने बताया कि वेदों और पुराणों में वर्णन मिलता है कि उस दिव्य क्षण में ब्रह्मा जी ने समस्त तीर्थों, नदियों और समुद्रों के पवित्र जल को अपने ब्रह्म कमंडल में समाहित कर पुष्कर सरोवर में स्थापित किया।
इसी जलधारा से जन्मा यह सरोवर आज ब्रह्म सरोवर या तीर्थराज पुष्कर के नाम से विश्वविख्यात है, जिसे सभी तीर्थों में श्रेष्ठ “तीर्थ गुरु” का दर्जा प्राप्त है।

सृष्टि की रचना का प्रारंभ

पंडित दाधीच ने बताया कि पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार इस पावन दिन भगवान विष्णु-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, और समस्त देवगणों ने चतुर्मुख ब्रह्मा जी को “जगत-पिता” की उपाधि से सम्मानित किया और उनसे सृष्टि की रचना करने का निवेदन किया।
ब्रह्मा जी ने यह दायित्व स्वीकार कर इसी दिन सृष्टि की संरचना का प्रारंभ किया — स्त्री-पुरुष, वनस्पति, जीव-जंतु और समस्त चराचर जगत का सृजन हुआ।

स्वर्ग और वैकुंठ में उत्सव

इस अवसर पर वैकुंठ लोक में भी उत्सव का आयोजन हुआ। ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं को संबोधित करते हुए घोषणा की कि यह दिन “ब्रह्म चतुर्दशी” और “बैकुंठ चतुर्दशी” के नाम से विश्व प्रसिद्ध होगा।

पुण्य और आध्यात्मिक फल

इस दिन पुष्कर तीर्थराज में स्नान, दान, हवन, पूजन, परिक्रमा और ब्रह्मा-सावित्री-गायत्री के दर्शन का विशेष महत्व है। ऐसा करने से अक्षय पुण्य फल प्राप्त होता है और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
शास्त्रों में वर्णन है कि इस दिन किया गया पुण्यकर्म हजार यज्ञों के फल के समान होता है।

संपूर्ण जगत के लिए शुभ संकेत

पंडित दाधीच के अनुसार इस वर्ष ब्रह्म चतुर्दशी का आगमन सर्वार्थ सिद्धि योग में होना भारतवर्ष और मानव समाज दोनों के लिए शुभ संकेत है। यह योग सृष्टि में समृद्धि, संतुलन और आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है।

पुष्कर में आस्था का सागर

पुष्कर सरोवर में मंगलवार को तड़के से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहेगा। तीर्थराज में डुबकी लगाकर भक्तजन ब्रह्मा-सावित्री, गायत्री माता और तीर्थराज पुष्कर का पूजन-अर्चन करेंगे। मठ-मंदिरों में वैदिक मंत्रोच्चार से पूजन और ब्रह्म यज्ञ का आयोजन होगा।

ब्रह्म चतुर्दशी और बैकुंठ चतुर्दशी, दोनों का यह पावन संगम सृष्टि के आरंभ, धर्म के उत्थान और ब्रह्मत्व की अनुभूति का प्रतीक बनकर विश्व में आस्था की अमिट ज्योति प्रज्वलित करता है।

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