अजमेर/ हरि प्रसाद शर्मा/राजस्थान के अजमेर नगर निगम चुनाव नतीजों ने सूबे की सियासत में बड़ा भूचाल ला दिया है। भारतीय जनता पार्टी के सबसे मजबूत पारंपरिक गढ़ों में शुमार अजमेर में करीब 36 वर्षों बाद कांग्रेस ने भगवा खेमे को पटखनी दी है। कुल 80 वार्डों के घोषित नतीजों में कांग्रेस ने 37 वार्डों पर परचम लहराया, जबकि सत्ताधारी भाजपा 32 सीटों पर सिमट गई। चुनाव में 11 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत (41 सीट) न मिलने के कारण अब निगम की सत्ता की चाबी पूरी तरह निर्दलीयों के हाथों में आ गई है।
वार्ड परिणामों का गणित
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दल / वर्ग |
जीती गई सीटें |
बहुमत (41) से दूरी |
|---|---|---|
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कांग्रेस |
37 |
-4 |
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भाजपा |
32 |
-9 |
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निर्दलीय / अन्य |
11 |
— |
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कुल वार्ड |
80 |
— |
दिग्गजों की फौज भी नहीं बचा पाई साख
अजमेर का परिणाम भाजपा संगठन के लिए आत्ममंथन का विषय बन गया है, क्योंकि जिले में पार्टी के पास कद्दावर नेताओं की पूरी फौज मौजूद थी:
- विधानसभा अध्यक्ष: वासुदेव देवनानी (अजमेर उत्तर)
- कैबिनेट मंत्री व विधायक: सुरेश रावत, अनीता भदेल (अजमेर दक्षिण), शंकर सिंह रावत, शत्रुघ्न गौतम, वीरेंद्र सिंह, रामस्वरूप लांबा
- वरिष्ठ नेता: राज्य धरोहर संरक्षण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष व वरिष्ठ नेता ओंकार सिंह लखावत
- प्रभारी नेतृत्व: अजमेर की प्रभारी मंत्री व उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी तथा उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा (अजमेर संसदीय क्षेत्र से जुड़ाव)
- संगठनात्मक महत्व: अजमेर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के चित्तौड़गढ़ प्रांत का मुख्यालय भी है।
इसके बावजूद भाजपा को मिली पराजय ने साबित कर दिया कि स्थानीय निकाय चुनावों में शीर्ष चेहरों के मुकाबले वार्ड स्तर के स्थानीय समीकरण और जमीनी पकड़ अधिक प्रभावी साबित हुए।
अनीता भदेल के वार्ड में मिली हार सबसे बड़ा झटका
भाजपा के लिए सबसे असहज स्थिति वरिष्ठ विधायक अनीता भदेल के गृह वार्ड में पार्टी प्रत्याशी की करारी हार रही। लगातार कई बार से विधायक भदेल के क्षेत्र में भाजपा की यह शिकस्त स्पष्ट संकेत देती है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं में नाराजगी और सत्ता विरोधी रुझान टिकट वितरण पर भारी पड़ा।
धर्मेंद्र राठौड़ की रणनीति ने बदली कांग्रेस की किस्मत
कांग्रेस ने इस चुनाव को गंभीरता से लेते हुए पूर्व आरटीडीसी चेयरमैन धर्मेंद्र राठौड़ को मैदान में उतारा था। राठौड़ ने वार्ड स्तर पर माइक्रो-मैनेजमेंट, असंतुष्ट नेताओं की गोलबंदी और बूथ स्तर की चुनावी मशीनरी को सक्रिय कर कांग्रेस को दशकों बाद बढ़त दिलाई। जहां भाजपा अंदरूनी गुटबाजी और अति-आत्मविश्वास से जूझती नजर आई, वहीं कांग्रेस ने सत्ता विरोधी लहर को भुनाने में सफलता पाई।
निर्दलीयों की भूमिका और आगे का शक्ति-परीक्षण
निगम में महापौर (मेयर) बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 41 का है:
- कांग्रेस की राह: कांग्रेस को महज 4 निर्दलीयों के समर्थन की दरकार है। पार्टी खेमे का दावा है कि जीतने वाले 11 निर्दलीयों में से कई बागी कांग्रेसी हैं, जिनका झुकाव पार्टी की ओर रहेगा।
- भाजपा की चुनौती: भाजपा को बोर्ड बनाने के लिए 9 निर्दलीय पार्षदों को साधना होगा। इसके लिए पार्टी को बड़े स्तर पर जोड़-तोड़ की राजनीति करनी होगी।
दोनों ही खेमों ने निर्दलीयों की बाड़ाबंदी और मान-मनौव्वल की कवायद तेज कर दी है। आने वाले दिनों में अजमेर के मेयर पद के लिए कांटे की टक्कर देखने को मिलेगी।