गौरव कोचर
जयपुर/बिचून। जयपुर जिले का बिचून क्षेत्र इस समय दो विपरीत ध्रुवों का केंद्र बना हुआ है। जहाँ एक ओर सरकार और रीको (RIICO) इसे एक बड़े औद्योगिक हब के रूप में विकसित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय धार्मिक आस्था के केंद्र ‘भैराणा धाम’ को बचाने के लिए संतों और श्रद्धालुओं ने मोर्चा खोल दिया है। विकास की दौड़ और आस्था के संरक्षण के बीच यह संघर्ष अब गहराता जा रहा है।
विकास की तस्वीर: जयपुर डेयरी का महा-प्रोजेक्ट
रीको के बिचून औद्योगिक क्षेत्र में विकास की गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जयपुर जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (जयपुर डेयरी) यहाँ 540 करोड़ रुपये की लागत से एक अत्याधुनिक प्लांट स्थापित करने जा रहा है।
- बड़ा निवेश: रीको ने डेयरी को 15 हेक्टेयर भूमि का ऑफर लेटर जारी कर दिया है।
- तकनीक: यहाँ दूध प्रोसेसिंग के साथ-साथ पैकेजिंग के लिए पॉलीफिल्म उत्पादन और बटर स्टोरेज की यूनिट्स लगेंगी।
- रोजगार: सरकार का दावा है कि 2029 तक शुरू होने वाले इस प्लांट से लगभग 1000 युवाओं को रोजगार मिलेगा। ‘राइजिंग राजस्थान’ समिट के तहत हुए एमओयू के बाद इस क्षेत्र में लोहिया एलॉयस जैसी अन्य बड़ी कंपनियां भी करीब 1500 करोड़ का निवेश कर रही हैं।
आस्था का संघर्ष: भैराणा धाम के लिए संतों का ‘अग्नि-तप’
औद्योगिक विस्तार की इस चमक के बीच दादूपंथी संतों की तपोस्थली भैराणा धाम (दादू पालकी) को लेकर भारी विरोध शुरू हो गया है। संतों का आरोप है कि रीको की औद्योगिक परियोजनाओं और भूमि आवंटन से इस पवित्र धाम के अस्तित्व और यहाँ की प्राचीन वनस्पति व पारिस्थितिकी को खतरा पैदा हो गया है।
विरोध के मुख्य बिंदु:
- संतों का प्रदर्शन: धाम की रक्षा के लिए संतों ने ‘अग्नि-तप’ शुरू कर दिया है। जलती अग्नि के बीच बैठकर संत सरकार को यह चेतावनी दे रहे हैं कि आस्था के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
- रीको के खिलाफ आक्रोश: स्थानीय लोगों और दादूपंथी समाज का कहना है कि औद्योगिक भूखंडों के नाम पर धाम की सीमा और गौचर भूमि को प्रभावित किया जा रहा है।
- संकल्प: प्रदर्शनकारी संतों ने स्पष्ट किया है कि जब तक रीको अपनी योजना को संशोधित नहीं करता और धाम की पवित्रता सुरक्षित नहीं होती, उनका आंदोलन जारी रहेगा।
विकास बनाम विरासत: प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
बिचून औद्योगिक क्षेत्र में जहाँ एक तरफ भारी निवेश (करीब 2000 करोड़ रुपये से अधिक) और रोजगार की संभावनाएं हैं, वहीं दूसरी ओर संतों का अग्नि-तप और जन-आक्रोश सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। निवेशकों के लिए बिचून ‘मनपसंद क्षेत्र’ तो बन गया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर दादूपंथी समाज के विरोध ने इस औद्योगिक विकास पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली सरकार इस विवाद का क्या समाधान निकालती है। क्या विकास की इस औद्योगिक एक्सप्रेस को भैराणा धाम की आस्था के साथ सामंजस्य बिठाकर आगे बढ़ाया जाएगा, या फिर यह आंदोलन आने वाले दिनों में और उग्र रूप लेगा?
“हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन हमारी तपोस्थली और विरासत की बलि देकर कारखाने नहीं लगने देंगे। भैराणा धाम का संरक्षण हमारी प्राथमिकता है।” — प्रदर्शनकारी संत