गौरव कोचर
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। जिस ‘खेला होबे’ के नारे से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विरोधियों को पस्त किया था, आज उसी ‘खेले’ का शिकार खुद तृणमूल कांग्रेस (TMC) हो गई है। पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ा तख्तापलट हो चुका है।
कद्दावर नेता ऋतब्रत बनर्जी ने टीएमसी के खेमे में इतनी बड़ी सेंध लगाई है कि पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखरती नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक, ऋतब्रत बनर्जी को 60 विधायकों का सीधा समर्थन मिल चुका है और वे विधानसभा में नए नेता विपक्ष (Leader of Opposition) की भूमिका में सामने आ रहे हैं।
ममता के अभेद्य किले में सेंध: कैसे हुआ यह ‘खेला’?
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती देना अब तक नामुमकिन माना जाता रहा है। लेकिन पर्दे के पीछे लंबे समय से सुलग रही असंतोष की चिंगारी अब ज्वालामुखी बनकर फट गई है। ऋतब्रत बनर्जी ने बेहद खामोशी से पार्टी के भीतर असंतुष्ट विधायकों को एकजुट किया।
60 विधायकों का यह आंकड़ा बंगाल की राजनीति में भूचाल लाने के लिए काफी है। इस बगावत ने न सिर्फ ममता बनर्जी के पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी है, बल्कि कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों को हिलाकर रख दिया है।
विधानसभा का नया समीकरण एक नजर में:
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विवरण |
संख्या/स्थिति |
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बागी विधायकों की संख्या |
60 विधायक |
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मुख्य सूत्रधार |
ऋतब्रत बनर्जी |
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नया राजनीतिक कद |
नेता विपक्ष (संभावित/दावेदार) |
अंदर की बात: सूत्रों का कहना है कि पार्टी के भीतर कुछ खास चेहरों को लगातार तरजीह दिए जाने और पुराने नेताओं की अनदेखी की वजह से यह बगावत हुई है। ऋतब्रत बनर्जी ने इसी नाराजगी को भुनाकर इतना बड़ा दांव खेल दिया।
कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी, जिन्होंने बदल दी बंगाल की तस्वीर?
ऋतब्रत बनर्जी बंगाल की राजनीति का कोई नया नाम नहीं हैं। वे बेहद चतुर और प्रखर वक्ता माने जाते हैं:
- छात्र राजनीति की पौध: ऋतब्रत बनर्जी ने वामपंथी छात्र संगठन (SFI) से अपनी राजनीति शुरू की थी और वे माकपा (CPI-M) के कोटे से राज्यसभा सांसद भी रहे।
- TMC में एंट्री और दबदबा: माकपा से अलग होने के बाद वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए। ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी के श्रमिक संगठन (INTTUC) की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी, जिसके जरिए उन्होंने जमीन पर अपनी पकड़ बेहद मजबूत कर ली।
- अचानक बगावत: किसी को अंदाजा नहीं था कि श्रमिक संगठन संभालने वाला यह नेता एक दिन सीधे ममता बनर्जी की सत्ता के समानांतर खड़ा हो जाएगा।
इस बगावत के 3 बड़े और दूरगामी असर
1. ममता बनर्जी की साख को गहरा धक्का
अब तक ममता बनर्जी को बंगाल की राजनीति का ‘एकछत्र राजgroup’ माना जाता था। लेकिन अपने ही घर में 60 विधायकों की यह बगावत उनकी रणनीतिक विफलता को दर्शाती है। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संकट साबित हो सकता है।
2. ‘नेता विपक्ष’ का बदला चेहरा
आमतौर पर विपक्ष का नेता किसी विरोधी दल का होता है। लेकिन इस अभूतपूर्व घटनाक्रम में, यदि टीएमसी का यह धड़ा अलग होकर बैठता है या किसी अन्य मोर्चे के साथ हाथ मिलाता है, तो ऋतब्रत बनर्जी विधिवत रूप से नेता विपक्ष के तौर पर स्थापित हो जाएंगे, जो सरकार के हर फैसले को चुनौती देंगे।
3. सरकार की स्थिरता पर सवालिया निशान?
भले ही तकनीकी रूप से ममता सरकार के पास अभी बहुमत का आंकड़ा प्रभावित न हो, लेकिन 60 विधायकों का अलग होना सरकार को नैतिक रूप से बेहद कमजोर कर देता है। विधानसभा के भीतर किसी भी बिल को पास कराने में अब सरकार के पसीने छूटने तय हैं।
अब आगे क्या? राजभवन और विधानसभा पर टिकी नजरें
इस महा-बगावत के बाद तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में हड़कंप मचा हुआ है। बागी विधायकों को मनाने और डैमेज कंट्रोल करने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं।
अब अगली बड़ी हलचल राजभवन और विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के दफ्तर में देखने को मिलेगी। क्या ऋतब्रत बनर्जी इन 60 विधायकों की परेड राज्यपाल के सामने करवाएंगे? क्याविधानसभा अध्यक्ष इस नए गुट को मान्यता देंगे? बंगाल की राजनीति में आने वाले कुछ घंटे बेहद रोमांचक और ऐतिहासिक होने वाले हैं।