पूर्णिमा विश्वविद्यालय में पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट कार्यक्रम का शुभारंभ; प्राचीन भारत के 8 लाख गुरुकुलों, 18 विद्याओं और 64 कलाओं पर हुई चर्चा
जयपुर, 29 जून 2026 / नरेश गुनानी /राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली केवल पाठ्य पुस्तकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह व्यावहारिक और समग्र जीवन के विकास से जुड़ी थी। अंग्रेज़ों के शासनकाल में जारी गजेटियरों के अनुसार, प्राचीन भारत में आठ लाख गुरुकुल थे, जहाँ विद्यार्थियों को 18 विद्याओं और 64 कलाओं का व्यावहारिक ज्ञान निशुल्क दिया जाता था। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) इसी प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से भारत के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त कर रही है।
राज्यपाल सोमवार को पूर्णिमा विश्वविद्यालय में विद्याभारती के सहयोग से आयोजित “भारतीय ज्ञान परंपरा-पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक शिक्षा, शोध और नवाचार” विषयक पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट कार्यक्रम (FDP) के उद्घाटन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम की शुरुआत में राज्यपाल और अन्य अतिथियों ने कॉन्फ्रेंस के आधिकारिक पोस्टर का विमोचन भी किया।
’विश्व वल्लभ’ ग्रंथ में छिपा है आधुनिक विज्ञान का आधार
अपने संबोधन में राज्यपाल ने 16वीं शताब्दी में महाराणा प्रताप के दरबारी लेखक चक्रपाणी मिश्र और उनके प्रसिद्ध ग्रंथ “विश्व वल्लभ” का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस ग्रंथ में:
- भू-जल की खोज और जल शुद्धिकरण की विरल तकनीकें मौजूद हैं।
- मौसम की भविष्यवाणी, कुंड और बावड़ी निर्माण के तरीके बताए गए हैं।
- बागवानी, पर्यावरण संरक्षण, वृक्षों की बीमारियां और उन्हें दूर करने के उन्नत कृषि-वानिकी उपाय शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि वह अपने समय में अत्यंत उपयोगी तकनीकों से समृद्ध थी, जिसे आज की दुनिया ‘आधुनिक विज्ञान’ कहती है।
मैकाले ने तोड़ी समृद्ध विरासत, महर्षि कणाद ने दिया अणु का ज्ञान
राज्यपाल ने भारत की प्राचीन वैदिक और श्रुति परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि यहाँ ज्ञान मौखिक रूप से सुनकर, चिंतन और मनन के जरिए आगे बढ़ता था। उन्होंने रणकपुर के जैन मंदिरों का उदाहरण देते हुए इसे कला-कौशल और शिल्प का अद्वितीय नमूना बताया।
लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने भारत की प्रबल नैतिकता और समृद्ध विरासत को नष्ट करने के लिए जानबूझकर हमारी शिक्षा पद्धति को बदला, ताकि देश को लंबे समय तक गुलाम रखा जा सके। इसके तहत देश के पारंपरिक उद्योग-धंधे बंद कर दिए गए।
पश्चिम और भारत के ज्ञान की तुलना करते हुए उन्होंने कहा:
”पश्चिम में टुकड़ों-टुकड़ों में ज्ञान देने की परंपरा है, जबकि भारत आरंभ से ही समग्र ज्ञान (Holistic Knowledge) के विज्ञान से जुड़ा रहा है। महर्षि कणाद ने सदियों पहले विश्व को अणु-परमाणु का ज्ञान दे दिया था, लेकिन आधुनिक विज्ञान में आज उनका नाम नहीं लिया जाता। इसी तरह दशमलव पद्धति का आविष्कार भी भारत में हुआ, जिससे पूरी दुनिया में गिनती की शुरुआत हुई।”
इतिहास और महापुरुषों के गौरव का स्मरण
राज्यपाल ने प्रभु श्रीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरुकुल शिक्षा पद्धति के कारण ही वे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बने। महर्षि विश्वामित्र के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार हिंसा का प्रतिकार उसी भाषा में न करने से समाज डरपोक बन जाता है, इसलिए सही समय पर प्रतिकार करना ही हमारे यहाँ अहिंसा का सर्वोत्तम मार्ग माना गया है। इसके अलावा उन्होंने बप्पा रावल का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने अरबों को सौ साल के लिए भारत से खदेड़ा था और पाकिस्तान के जिस स्थान पर विश्राम किया, वह आगे चलकर उन्हीं के नाम पर ‘रावलपिंडी’ कहलाया। उन्होंने महर्षि अरविंद घोष के विचारों के अनुरूप विद्यार्थियों में संयम, शांति और नैतिक मूल्यों को बढ़ाने का आह्वान किया।
भारत की समृद्ध वैज्ञानिक पृष्ठभूमि: सांसद मदन राठौड़
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सांसद मदन राठौड़ ने कहा कि भारत में विज्ञान आदिकाल से ही अत्यंत विकसित अवस्था में था। हमारे पुराणों में दर्ज उन्नत विमानों और तकनीकी प्रसंगों का आज बाकायदा वैज्ञानिक आधार दिखाई देता है। इसी समृद्ध ज्ञान और वैभव के कारण प्राचीन काल में हिंदुस्तान को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था और पाश्चात्य देश यहाँ आने के लिए लालायित रहते थे। भारत ने ही पूरे विश्व को सिखाया कि ज्ञान को किस सही दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
इससे पूर्व, पूर्णिमा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष शशिकांत सिंधी ने पांच दिनों तक चलने वाले इस फैकल्टी डेवलपमेंट और शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा और इसके उद्देश्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।