पुस्तकालय सेवाओं में तकनीक और एआई का समावेश अनिवार्य: हरिभाऊ बागडे
| नरेश गुनानी
आगरा/जयपुर, 5 फरवरी। राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा है कि पुस्तकें सभ्यता और संस्कृति की उन्नति का सबसे बड़ा मार्ग हैं। उन्होंने आह्वान किया कि युग की मांग के अनुसार प्राचीन पुस्तकों और पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किया जाना चाहिए।
गुरुवार को आगरा में केंद्रीय हिंदी संस्थान और भारतीय पुस्तकालय संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए राज्यपाल ने ये विचार व्यक्त किए। सम्मेलन का मुख्य विषय ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में पुस्तकालय सेवाओं का रूपान्तरण’ रहा। इस अवसर पर उन्होंने ‘केंद्रीय हिंदी संस्थान ज्ञानकोश’ का ऑनलाइन लोकार्पण भी किया।
बौद्धिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता
राज्यपाल ने भारत की समृद्ध ज्ञान विरासत पर प्रकाश डालते हुए इतिहास के काले पन्नों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा:
- विदेशी आक्रांताओं ने भारत के ज्ञान तंत्र को नष्ट करने के लिए हमारे पुस्तकालयों को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया।
- 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को जलाना इसी मानसिकता का परिचायक था।
- दुर्लभ पांडुलिपियों का गायब होना यह दर्शाता है कि बौद्धिक विरासत को मिटाने के प्रयास निरंतर होते रहे हैं।
उन्होंने गौरव के साथ स्मरण कराया कि भारत ही वह देश है जहाँ विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद रचा गया, जिसे ऋषियों ने पीढ़ियों तक मौखिक परंपरा से सहेजा और बाद में लिपिबद्ध किया।
तकनीक और ‘वन नेशन, वन डिजिटल लाइब्रेरी’
बदलते दौर में तकनीक की भूमिका को अहम बताते हुए हरिभाऊ बागडे ने कहा:
- डिजिटल माध्यम: आज भारतीय ज्ञान परंपरा की पुस्तकें केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि डिजिटल रूप में समाज की सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब बन रही हैं।
- ऐतिहासिक पहल: उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा दी गई ‘वन नेशन, वन डिजिटल लाइब्रेरी’ की अवधारणा को ऐतिहासिक बताया।
- अनुवाद की शक्ति: सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने पांडुलिपियों और महत्वपूर्ण ग्रंथों के अधिक से अधिक आधुनिक भाषाओं में अनुवाद पर जोर दिया।
शिक्षा और विचार संस्कृति पर प्रहार
ब्रिटिश कालीन शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हुए राज्यपाल ने कहा कि अंग्रेजों ने शिक्षा को केवल ‘रोजगार’ से जोड़ दिया, जिससे पढ़ने की प्रवृत्ति ‘रटने’ तक सीमित हो गई। इससे देश की बौद्धिक क्षमता को भारी नुकसान पहुँचा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की मूल परंपरा रटने की नहीं बल्कि पुस्तकों के माध्यम से स्वयं को विकसित करने और विचार संस्कृति के निर्माण की रही है।