अत्यधिक मीठा खिलाना बन रहा बीमारी का कारण, पशुप्रेमियों ने की प्राकृतिक आहार की अपील
(हरिप्रसाद शर्मा) पुष्कर/अजमेर
तीर्थ नगरी पुष्कर की पहाड़ियों और घाटी क्षेत्र में इन दिनों बेजुबान वानर एक गंभीर स्वास्थ्य संकट से जूझ रहे हैं। पुष्कर घाटी सहित आसपास के क्षेत्रों में वानरों में त्वचा संबंधी (Skin Disease) बीमारी तेजी से फैल रही है, जिसके चलते उनके हाथ-पैरों पर गंभीर खुजली और घाव देखे जा रहे हैं। स्थानीय निवासियों और पशुप्रेमियों ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
मीठा आहार बना वानरों का दुश्मन
विशेषज्ञों और जीव-प्रेमियों के अनुसार, वानरों में इस बीमारी के बढ़ने का एक मुख्य कारण मानवीय हस्तक्षेप और गलत खान-पान है। अक्सर श्रद्धालु धार्मिक आस्था के चलते वानरों को शक्कर से बने पकवान, बिस्कुट और अन्य अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थ खिलाते हैं।
- विशेषज्ञों का मत: वानरों का पाचन तंत्र और शरीर प्राकृतिक आहार के लिए बना है। कृत्रिम चीनी और प्रोसेस्ड फूड उनके रक्त में विकार पैदा कर रहे हैं, जिससे त्वचा रोग और अन्य आंतरिक बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
प्राकृतिक आहार देने की अपील
पशुसेवकों और विशेषज्ञों ने नागरिकों से विशेष अपील जारी की है। उन्होंने आग्रह किया है कि श्रद्धा प्रकट करने के लिए वानरों को बीमारी की ओर न धकेलें। इसके बजाय उन्हें निम्नलिखित प्राकृतिक आहार दें:
- कंद-मूल एवं फल: केला, अमरूद और अन्य मौसमी फल।
- सब्जियाँ: कच्ची सब्जियाँ जो उनके स्वास्थ्य के लिए हितकारी हैं।
- प्राकृतिक भोजन: पेड़-पौधों के पत्ते और टहनियाँ।
चिकित्सा सहायता की दरकार
मांगलियावास और आसपास के क्षेत्र के जीव-सेवा से जुड़े लोगों का कहना है कि कई वानर असहनीय पीड़ा में हैं और उन्हें तत्काल चिकित्सकीय देखरेख की आवश्यकता है। उन्होंने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन से मांग की है कि:
- प्रभावित वानरों के लिए विशेष मेडिकल कैंप या रेस्क्यू टीम का गठन किया जाए।
- बीमार वानरों को चिन्हित कर उनके घावों पर उपचार और आवश्यक दवाएं दी जाएं।
जन-जागरूकता ही एकमात्र समाधान
पशुसेवकों ने दो टूक कहा है कि जब तक लोग वानरों को मीठा खिलाना बंद नहीं करेंगे, तब तक उपचार का प्रभाव भी सीमित रहेगा। जीव सेवा से जुड़े संगठनों ने आमजन से आग्रह किया है कि इन बेजुबान जीवों को असहनीय पीड़ा से बचाने के लिए ‘जागरूक नागरिक’ की भूमिका निभाएं और दूसरों को भी इसके प्रति सचेत करें।
