लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 816 से 850 तक करने का प्रस्ताव; दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को दूर करने और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की रणनीति
गौरव कोचर
नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार देश के राजनीतिक ढांचे और चुनावी नक्शे में एक ऐतिहासिक बदलाव करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सरकार ने संसद में परिसीमन (Delimitation) से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयक—संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026, और संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक 2026 पेश कर नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन की रूपरेखा तैयार की है।
इस नए कदम का मुख्य उद्देश्य जहां एक ओर देश की बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है, वहीं दूसरी ओर लंबे समय से लंबित 33 प्रतिशत महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को धरातल पर उतारना है। विवादों से बचने के लिए सरकार ने क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए बेहद रणनीतिक कदम उठाए हैं।
विवादों से बचने के लिए सरकार का मास्टरस्ट्रोक: ‘नो लॉस’ फॉर्मूला
पिछले पांच दशकों (1971 की जनगणना के बाद) से लोकसभा सीटों की संख्या 543 पर फ्रीज है। नए परिसीमन को लेकर सबसे बड़ा विवाद यह था कि जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर शानदार काम करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) का प्रतिनिधित्व संसद में कम हो जाएगा, जबकि उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी।
इस विवाद और क्षेत्रीय असंतुलन को समाप्त करने के लिए सरकार ने “समानुपातिक सीट वृद्धि मॉडल” तैयार किया है:
- सीटों में 50% की भारी बढ़ोतरी: नए प्रस्ताव के तहत लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को बढ़ाकर 816 से 850 के बीच (करीब 815 राज्यों के लिए और 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए) करने का प्रावधान है।
- दक्षिण के राज्यों को नुकसान नहीं: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था से दक्षिण भारत के राज्यों की मौजूदा 129 सीटों की संख्या बढ़कर 195 हो जाएगी।
- प्रतिशत हिस्सेदारी रहेगी बरकरार: कुल सदन में दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व पहले की तरह लगभग 24 प्रतिशत के आसपास ही बना रहेगा, जिससे उनके राजनीतिक रसूख पर कोई आंच नहीं आएगी।
टीएमसी समेत अन्य क्षेत्रीय दलों का रुख और राजनीतिक समीकरण
इस संवेदनशील विधेयक को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार को न केवल अपने सहयोगियों, बल्कि विपक्ष के भी कुछ धड़ों का मौन या प्रत्यक्ष साथ मिलता दिख रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) और कुछ अन्य क्षेत्रीय दल इस बात को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं कि परिसीमन के बहाने राज्यों के संघीय अधिकारों (Federal Rights) का हनन न हो। चूंकि सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी राज्य की मौजूदा सीटों में कटौती नहीं होगी, बल्कि आनुपातिक रूप से सभी की सीटें बढ़ेंगी, इसलिए क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति करने वाले दलों का विरोध काफी हद तक नरम पड़ा है।
साथ ही, इस विधेयक के पास होने से ही 2029 के आम चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलना संभव हो सकेगा। कोई भी राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से महिला आरक्षण को रोकने का जोखिम उठाकर महिला मतदाताओं की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता, यही कारण है कि पर्दे के पीछे कई विपक्षी दल भी इस व्यवस्था पर रजामंद नजर आ रहे हैं।
2011 की जनगणना बनेगी आधार!
विधेयक की एक और खास बात यह है कि इसमें परिसीमन की प्रक्रिया को गति देने के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाने का प्रस्ताव शामिल किया गया है। वर्तमान में जारी डिजिटल जनगणना के तहत पहले चरण में मकानों का सूचीकरण चल रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत जनगणना के चरण में जातिगत डेटा भी दर्ज किया जाएगा, जिससे विपक्ष की जातिगत जनगणना की मांग को भी इसमें समाहित करने का प्रयास किया गया है।
अदालती दखल से बाहर होगी प्रक्रिया:
संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत नए परिसीमन आयोग के फैसलों और सीमाओं के निर्धारण को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। आयोग की कमान सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज के हाथों में होगी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के चुनाव आयुक्त शामिल रहेंगे।
2029 के नए भारत की राजनीतिक नींव
यह नया विधेयक केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का जरिया नहीं है, बल्कि यह आगामी दशकों के लिए भारतीय लोकतंत्र का नया चेहरा तय करेगा। सरकार का यह दावा कि “किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा”, यदि जमीन पर पूरी तरह सही साबित होता है, तो यह भारतीय संघवाद (Federalism) को बिना नुकसान पहुंचाए देश की संसद को नया स्वरूप देने का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि संसद के आगामी सत्रों में इस पर आम सहमति की अंतिम मुहर कैसे लगती है।