लोकेंद्र सिंह शेखावत
भागलपुर, बिहार। त्रिपुरसुंदरी महेश्वरी शक्ति की सबसे मनोहर श्रीविग्रह वाली महाविद्या है। माता त्रिपुरसुंदरी (षोडशी/ललिता) दस महाविद्याओं में तीसरी और सर्वोच्च सौंदर्य, ऐश्वर्य, भोग एवं मोक्ष की देवी हैं। वे राजराजेश्वरी के रूप में पूजी जाती हैं, जो तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और तीन लोकों की स्वामिनी हैं।
तथा सोलह अक्षरों के मंत्र वाली माता षोडशी की अंगकांति उदयीमान सूर्यमंडल की आभा की भांति है। इनकी चार भुजाएं एवं तीन नेत्र हैं। यह शांत मुद्रा में लेटे हुए सदाशिव पर स्थित कमल के आसन पर आसीन हैं। वर देने के लिए सदा-सर्वदा तत्पर भगवती का श्रीविग्रह सौम्य और हृदय दया से आपूरित है। जो इनका आश्रय ग्रहण कर लेते हैं, उनमें और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता है। वस्तुतः इनकी महिमा अवर्णनीय है।

इस सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी उर्फ बाबा-भागलपुर, महान भविष्यवेत्ता ने लिखित रूप से सुगमतापूर्वक बतलाया कि:- तंत्र साधना के लिए सर्वाधिक सिद्धि दायक स्थान कामरूप क्षेत्र के नील पर्वत पर स्थित माँ कामाख्या का पवित्र धाम है, जहाँ तंत्र-साधना में महाविद्या षोडशी (कामाख्या) का प्राकृतिक योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। संसार के समस्त मंत्र तंत्र इनकी आराधना करते हैं। वेद भी इनका वर्णन करने में असमर्थ हैं। भक्तों को यह प्रसन्न होकर सब कुछ दे देती है, अभीष्ट तो सीमित अर्थ वाच्य है। प्रशांत हिरण्यगर्भ ही शिव हैं और इन्हीं की शक्ति षोडशी है। तंत्र शास्त्रों में षोडशी देवी को पंचवक्त्र बताया गया है। चारों दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें पंचवक्त्रा कहा जाता है। देवी के पाँचों मुख तत्पुरुष, सदोजात, वामदेव, अघोर और ईशान शिव के पाँचों रूपों के प्रतीक हैं। पाँचों दिशाओं के रंग क्रमशः हरित, रक्त, धूम्र, नील और पीत होने से यह मुख भी उन्हीं रंगों के हैं। देवी के दस हाथों में क्रमशः अभय, टंक, शूल, वज्र खड्ग,पाश,अंकुश घंटा,नाग और अग्रिन हैं। इसमें षोडश कलाएँ पूर्ण रूप से विकसित है। अतएव यह षोडशी कहलाती है। षोडशी को श्रीविद्या भी माना जाता है। इनकी उपासना श्रीचक्र में होती है। इनके ललिता, राज-राजेश्वरी, माँ त्रिपुरसुंदरी, बालापंचदशी आदि अनेक नाम हैं। इन्हें आद्याशक्ति माना जाता है। अन्य विद्याएँ भोग या मोक्ष में से एक ही देती है। यह अपने उपासक को भुक्ति-मुक्ति दोनों प्रदान करती है। इनके स्थूल, सूक्ष्म पर तथा तुरीय चार रूप हैं। एक बार पराम्बा पार्वती जी ने भगवान शिव जी से पूछा? भगवान! आपके द्वारा रचित तंत्र शास्त्र की साधना से जीवन के आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएँगे, किंतु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृत्ति तो नहीं होगी। कृपा करके इस दुख से निवृत्ति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई उपाय बताइए। माता पराम्बा के अनुरोध पर भगवान शंकर ने षोडशी श्रीविद्या साधना प्रणाली को प्रकट किया। आदिगुरू श्रीशंकराचार्य ने भी श्रीविद्या के रूप में इन्हीं षोडशी देवी की उपासना की थी। इसलिए आज भी सभी शंकरपीठों में भगवती षोडशी, राजेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी की श्रीयंत्र के रूप में आराधना चली आ रही है। भगवान शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी में षोडशी श्रीविद्या की स्तुति करते हुए कहा है कि “अमृत के समुद्र में एक मणिका द्वीप है, जिसमें कल्पवृक्ष की बारी है, नवरत्नों के नौ परकोटे हैं, उस वन में चिंतामणि से निर्मित महल में ब्रह्ममय सिंहासन है, जिसमें पंच कृत्य के देवता ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर आसन के पाए हैं और सदाशिव फलक हैं। सदाशिव के नाभि से निर्गत कमल पर विराजमान भगवती षोडशी त्रिपुरसुंदरी माता का जो ध्यान करते हैं, वे धन्य है। भगवती के प्रभाव से उन्हें भोग और मोक्ष दोनों सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। भैरवयामल तथा शक्ति लहरी में इनकी उपासना का विस्तृत व्याख्या है। दुर्वासा ऋषि इनके परमाराधक थे।
