पपीते की खेती में ‘रेड ग्लो’ वैरायटी से आएगी नई क्रांति, NSC के बीजों से किसान घर बैठे बदल सकेंगे अपनी किस्मत

| अजय द्विवेदी 

भोपाल। कोरोना काल के बाद भारतीय कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक फसलों के बजाय अब देश के किसानों का झुकाव ‘नगदी फसलों’ (Cash Crops) की ओर तेजी से बढ़ा है। इस दिशा में पपीते की खेती एक बेहद लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है। पपीते की बागवानी में सफलता सुनिश्चित करने के लिए नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन (NSC) की ‘रेड ग्लो’ (Red Glow) हाइब्रिड वैरायटी किसानों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

ऑनलाइन उपलब्ध हैं उच्च गुणवत्ता वाले बीज

​आधुनिक दौर में किसानों की सुविधा के लिए नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन ने अपने ऑनलाइन स्टोर पर रेड ग्लो वैरायटी के बीज उपलब्ध कराए हैं। अब किसान घर बैठे ही पपीते के उन्नत हाइब्रिड बीज मंगवा सकते हैं, जिससे उन्हें गुणवत्ता और शुद्धता की पूरी गारंटी मिलती है।

60 दिनों में शुरू होती है कमाई

​रेड ग्लो वैरायटी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी त्वरित पैदावार है। रोपाई के महज 60 दिन बाद ही पौधों में फल आने शुरू हो जाते हैं।

  • पैदावार: एक पौधा तीन बार में लगभग 50 से 60 किलोग्राम तक फल देता है।
  • मुनाफा: विशेषज्ञों के अनुसार, मात्र 1 कट्ठा खेत में इस वैरायटी के माध्यम से किसान एक बार में 75 हजार रुपये तक की शानदार कमाई कर सकते हैं।
  • फल का वजन: इस वैरायटी का एक फल औसतन 3 से 4 किलो का होता है, जो बाजार में अच्छी कीमत दिलाता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता और लंबी ‘शेल्फ लाइफ’

​अक्सर पपीते की खेती में कीट और बीमारियां बड़ी चुनौती होती हैं, लेकिन रेड ग्लो किस्म में बीमारियों और कीटों के प्रति जबरदस्त प्रतिरोधक क्षमता होती है। इससे किसानों को फसल सुरक्षा पर कम खर्च करना पड़ता है और नुकसान की आशंका न्यूनतम रहती है। इसके अलावा, फल की ‘शेल्फ लाइफ’ लंबी होने के कारण इसे दूर-दराज की मंडियों और बड़े शहरों तक बिना खराब हुए भेजा जा सकता है।

रेड ग्लो वैरायटी की मुख्य विशेषताएं

  • रंग और स्वाद: फल अंदर से गहरे लाल या ऑरेंज रंग के होते हैं। स्वाद में यह अत्यधिक मीठा और रसदार होता है।
  • पौधे की संरचना: पौधे की ऊंचाई लगभग 7 फीट तक रहती है, जिससे फलों की तुड़ाई आसान होती है।
  • कुल उपज: एक पेड़ से पूरे सीजन में 80 से 100 किलोग्राम तक की कुल उपज प्राप्त की जा सकती है।

खेती के लिए उन्नत तकनीक और प्रबंधन

​सफल उत्पादन के लिए सही प्रबंधन अनिवार्य है:

  1. खेत की तैयारी: अच्छी जुताई के साथ प्रति हेक्टेयर 20-25 टन गोबर की खाद या कंपोस्ट मिलाएं।
  2. रोपण: 1x1x1 फुट के गड्ढे तैयार करें। पौधों के बीच की दूरी (पौधे से पौधा) 5 फीट और पंक्तियों के बीच की दूरी 6 फीट रखें।
  3. सिंचाई: गर्मियों में हर 3-4 दिन और सर्दियों में 6-7 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। ध्यान रहे कि जलभराव न हो, अन्यथा जड़ें सड़ने का खतरा रहता है।

आदर्श जलवायु

​पपीते की खेती के लिए गर्म जलवायु सबसे उपयुक्त है। 22 से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान इसके लिए आदर्श माना जाता है। भारत की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए इसकी रोपाई साल में तीन अलग-अलग समय पर की जा सकती है, जिससे निरंतर उत्पादन संभव है।

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