“नीली बत्ती लगी गाड़ी देखकर भड़क गए मंत्री असीम अरुण, पुलिस कमिश्नर से बोले – इसका चालान काटो”

“नीली बत्ती लगी गाड़ी देखकर भड़क गए मंत्री असीम अरुण, पुलिस कमिश्नर से बोले – इसका चालान काटो”

रिपोर्ट: धनंजय त्यागी 
Edited By : गणेश शर्मा 
टेलीग्राफ टाइम्स
जुलाई 01,2025

वाराणसी।
वीआईपी कल्चर के खिलाफ एक अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हुए उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने एक सख्त और सधे हुए रुख के जरिए सिस्टम को आईना दिखा दिया। पूर्व आईपीएस अधिकारी और वर्तमान में योगी सरकार के मंत्री असीम अरुण ने खुद के काफिले में दी गई नीली बत्ती लगी सरकारी गाड़ी को लेने से न सिर्फ इनकार किया, बल्कि उसका चालान करने के लिए पुलिस कमिश्नर को चिट्ठी तक लिख दी

2017 में खत्म हुआ था लाल-नीली बत्ती का दौर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार ने वर्ष 2017 में देश में वीआईपी कल्चर खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया था। इसके तहत मंत्रियों, अधिकारियों और अन्य वीआईपी व्यक्तियों की गाड़ियों पर लाल और नीली बत्ती के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसका उद्देश्य जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच की दूरी को मिटाना और सत्ता के प्रतीकों को खत्म करना था।

प्रोटोकॉल गाड़ी में लगी थी नीली बत्ती

सोमवार को मंत्री असीम अरुण वाराणसी के दौरे पर थे। प्रोटोकॉल के तहत उन्हें एक इनोवा गाड़ी उपलब्ध कराई गई, जिस पर अनधिकृत नीली बत्ती लगी थी। गाड़ी को देखकर असीम अरुण ने प्रशासन से यह वाहन लेने से साफ इनकार कर दिया।

चालान के लिए भेजी चिट्ठी और फोटो

मंत्री असीम अरुण ने सिर्फ गाड़ी लौटाने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि एक कड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए वाराणसी के पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल को चिट्ठी लिखकर उस गाड़ी का चालान करने की मांग की। इसके साथ ही उन्होंने गाड़ी की तस्वीर भी संलग्न की, ताकि कार्रवाई में कोई देरी या भ्रम की गुंजाइश न रहे।

पूर्व आईपीएस अफसर की अनुकरणीय सख्ती

गौरतलब है कि असीम अरुण खुद एक पूर्व आईपीएस अधिकारी रह चुके हैं। उनके पिता भी उत्तर प्रदेश के डीजीपी पद पर रह चुके हैं। प्रशासनिक सेवा के अनुभव के चलते असीम अरुण नियमों और उनकी गरिमा को भली-भांति समझते हैं। इसीलिए उन्होंने सार्वजनिक पद पर रहते हुए भी एक नियम उल्लंघन को हल्के में नहीं लिया।

सख्त रुख की हो रही सराहना

मंत्री के इस रुख की हर ओर प्रशंसा हो रही है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों में इसे एक ऐसा उदाहरण बताया जा रहा है, जो अन्य जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को भी प्रेरित कर सकता है कि वे खुद को कानून से ऊपर न समझें।

 

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