नागरिकता विवाद पर वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे की दोटूक- ‘पासपोर्ट सिर्फ यात्रा दस्तावेज, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं’

नई दिल्ली / नरेश गुनानी/​”क्या आपके पास भारतीय पासपोर्ट है? अगर हाँ, तो बधाई हो, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह आपकी भारतीय नागरिकता का अचूक प्रमाण है।”

​हाल ही में नागरिकता और पासपोर्ट को लेकर सोशल मीडिया और कानूनी गलियारों में एक बहस छिड़ गई है। इस विवाद के बीच देश के दिग्गज कानूनविद् और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस पूरे कानूनी गणित को बेहद आसान भाषा में समझाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारत के नागरिकता कानून और पासपोर्ट अधिनियम के तहत वास्तविक स्थिति क्या है।

​विवाद क्या है?

​दरअसल, हाल ही में कुछ अदालती मामलों और प्रशासनिक फैसलों के बाद यह सवाल खड़ा हुआ कि क्या किसी व्यक्ति के पास भारतीय पासपोर्ट होने मात्र से वह कानूनी रूप से भारत का नागरिक मान लिया जाएगा? कई लोगों का मानना था कि पासपोर्ट सरकार द्वारा जारी किया जाता है, इसलिए यह नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण (Conclusive Proof) है। लेकिन कानूनी हकीकत इससे अलग है, जिसने आम जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी।

हरीश साल्वे ने क्या समझाया? (पूरा नियम)

​वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने इस भ्रम को दूर करते हुए भारतीय कानून के महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने रखा:

​1. पासपोर्ट सिर्फ एक ‘यात्रा दस्तावेज’ है

​साल्वे के अनुसार, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (Passport Act, 1967) के तहत पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है। यह भारत सरकार द्वारा अपने नागरिक को विदेश यात्रा करने और वापस आने की अनुमति देने के लिए जारी किया जाता है। यह इस बात का प्रथम दृष्ट्या (Prima Facie) सबूत तो हो सकता है कि धारक भारतीय है, लेकिन यह नागरिकता का अंतिम या अकाट्य प्रमाण (Conclusive Proof) नहीं है।

​2. नागरिकता अधिनियम, 1955 का दबदबा

​भारतीय नागरिकता पूरी तरह से नागरिकता अधिनियम, 1955 (Citizenship Act, 1955) और भारत के संविधान के अनुच्छेदों द्वारा तय होती है। साल्वे ने स्पष्ट किया:

​”अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता पर कोई कानूनी सवाल या विवाद खड़ा होता है, तो उसका फैसला नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों के तहत होगा, न कि इस आधार पर कि उसके पास पासपोर्ट है।”

 

​3. धोखे या गलती से बना पासपोर्ट मान्य नहीं

​यदि किसी व्यक्ति ने गलत तथ्य देकर, जाली दस्तावेजों के सहारे या किसी प्रशासनिक चूक की वजह से भारतीय पासपोर्ट हासिल कर लिया है, तो केवल पासपोर्ट होने से वह भारत का कानूनी नागरिक नहीं बन जाता। जांच होने पर यदि यह पाया जाता है कि वह व्यक्ति नागरिकता अधिनियम की शर्तों को पूरा नहीं करता, तो उसका पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है और उसे अवैध माना जाएगा।

​नागरिकता और पासपोर्ट में मुख्य अंतर

​इसे और आसानी से समझने के लिए नीचे दी गई तालिका को देखें:

विशेषता

भारतीय नागरिकता (Citizenship)

भारतीय पासपोर्ट (Passport)

मूल कानून

नागरिकता अधिनियम, 1955 और संविधान

पासपोर्ट अधिनियम, 1967

प्रकृति

एक कानूनी दर्जा और अधिकार है।

एक पहचान और यात्रा दस्तावेज है।

प्रामाणिकता

यह अंतिम और अकाट्य सच है।

यह नागरिकता का केवल एक ‘संकेत’ है, अंतिम प्रमाण नहीं।

क्या छीनी जा सकती है?

केवल विशेष कानूनी प्रक्रियाओं और देशद्रोह जैसी स्थितियों में।

गलत जानकारी या नियमों के उल्लंघन पर आसानी से रद्द या जब्त किया जा सकता है।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है?

​हरीश साल्वे की इस व्याख्या से आम नागरिकों को डरने की जरूरत नहीं है। यदि आप जन्म से भारतीय हैं या आपने वैध तरीके से नागरिकता हासिल की है, तो आपका पासपोर्ट पूरी तरह सुरक्षित है।

​यह नियम मुख्य रूप से उन मामलों में लागू होता है जहां:

  • ​किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता संदिग्ध हो।
  • ​किसी ने दोहरी नागरिकता ले रखी हो (क्योंकि भारत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता)।
  • ​किसी विदेशी नागरिक ने अवैध तरीके से भारतीय दस्तावेज बनवा लिए हों।

​ हरीश साल्वे ने साफ कर दिया है कि कानून की नजर में ‘नागरिकता’ एक बड़ी और व्यापक अवधारणा है, जबकि ‘पासपोर्ट’ उसका महज एक प्रशासनिक परिणाम है। इसलिए, नागरिकता साबित करने के लिए बुनियादी कानूनी शर्तों (जैसे जन्म, वंश या पंजीकरण) को पूरा करना ही अंतिम सत्य है।

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