धार्मिक नगरी पुष्कर में भागवत कथा का दूसरा दिन: कथावाचक पवन कुमार बोले- ‘मुक्ति का एकमात्र साधन है श्रीमद्भागवत श्रवण’

हरि प्रसाद शर्मा 

पुष्कर (अजमेर)। तीर्थ नगरी पुष्कर के दाधीच भवन में आयोजित हो रही संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कथा के द्वितीय दिवस पर व्यासपीठ से बोलते हुए विख्यात कथावाचक पवन कुमार मालोदिया (वारंगल, तेलंगाना) ने भागवत श्रवण की महिमा और इसके आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि कलयुग के इस दौर में सांसारिक बंधनों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र सबसे सुलभ साधन भगवान की कथा का श्रवण ही है।

​मुख्य बिंदु:

  • कथा व्यास: पवन कुमार मालोदिया, वारंगल (तेलंगाना)।
  • प्रमुख प्रसंग: भीष्म स्तुति, शुक-परीक्षित मिलन, सूत-शौनक संवाद और विदुरानी द्वारा केले के छिलकों का भोग।
  • विशेष आकर्षण: बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह और विदुर जी की मनमोहक जीवंत झांकियां।
  • मुख्य यजमान: कमलकिशोर मालोदिया परिवार (खरेश, सूरत)।
  • अवधि: कथा आगामी 25 मई तक प्रतिदिन दोपहर 1:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक चलेगी।

​’अकाल मृत्यु से मरने वाले जीवों की मुक्ति का मार्ग है भागवत’

​व्यासपीठ से कथा का वाचन करते हुए पवन कुमार मालोदिया ने राजा परीक्षित का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि जब ऋषियों द्वारा राजा परीक्षित को सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से मृत्यु होने का श्राप (भविष्यवाणी) मिला, तब उनकी मुक्ति के लिए एकमात्र साधन भागवत श्रवण को ही बताया गया।

​कथावाचक ने भक्तों को समझाते हुए कहा कि जो जीव सर्पदंश, जल में डूबने, अग्नि में जलने या किसी दुर्घटना जैसी अकाल मृत्यु (अधोगति) को प्राप्त होते हैं, उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए परिजनों को श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन अवश्य करवाना चाहिए।

​कलयुग के पांच वास स्थान और स्वर्ण का प्रसंग

​कथा के दौरान कलयुग के आगमन और राजा परीक्षित द्वारा उसे दिए गए पांच स्थानों के प्रसंग का भी विस्तार से वर्णन किया गया। कथावाचक ने बताया कि कलयुग का वास उन स्थानों पर होता है जहाँ द्यूत (जुआ), मदिरापान, पर-स्त्री गमन, हिंसा और स्वर्ण (सोना) होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजा परीक्षित के मस्तक पर जो सोने का मुकुट था, वह अधर्म के आचरण से प्राप्त किया गया था, इसी कारण कलयुग ने उनके मस्तक में प्रवेश किया। कलयुग की विशेषता यही है कि यहाँ धर्म या अधर्म युक्त आचरण का फल जीव को अविलंब (तुरंत) प्राप्त होता है।

​भगवान ने चखा विदुरानी के केले के छिलकों का स्वाद

​कथा के अन्य प्रसंगों में कथावाचक ने भीष्म स्तुति, शुक-परीक्षित मिलन और सूत-शौनक संवाद का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने भगवान कृष्ण और विदुर जी के प्रेम का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब ठाकुर जी दुर्योधन के छप्पन भोग त्यागकर विदुर जी के घर पहुंचे, तो वहाँ विदुरानी ने भक्ति के अतिरेक में भगवान को केले के बजाय उसके छिलके ही खिला दिए और भगवान ने भी बड़े चाव से उन छिलकों का भोग लगाया। यह प्रसंग सुनकर पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए।

​मनमोहक झांकियों ने मोहा मन, अतिथियों का हुआ सम्मान

​कथा के दौरान भजनों की धुन पर भगवान की लीलाओं के साथ-साथ अत्यंत सुंदर और जीवंत झांकियां सजाई गईं। इनमें बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह और भक्त विदुर जी की झांकी मुख्य आकर्षण का केंद्र रही, जिसके दर्शन कर श्रद्धालु निहाल हो गए।

​व्यासपीठ से कथावाचक ने समारोह में पधारे गणमान्य अतिथियों को दुपट्टा ओढ़ाकर आशीर्वाद प्रदान किया। इस धार्मिक आयोजन में गजेंद्र सिंह, परमेश्वर रिणवा, अजमेर से पवन मिश्रा, जैतारण से मनीष व्यास और माणकचन्द करेश्या सहित बड़ी संख्या में स्थानीय व प्रवासी श्रद्धालु मौजूद रहे।

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