धान खरीदी महाकुंभ: बिचौलियों के आगे बेबस प्रशासन, कुडेकला समिति में नियमों की उड़ी धज्जियाँ

धान खरीदी महाकुंभ: बिचौलियों के आगे बेबस प्रशासन, कुडेकला समिति में नियमों की उड़ी धज्जियाँ

| रिपोर्ट गणपत चौहान छत्तीसगढ़

छाल (रायगढ़)। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का तथाकथित ‘महाकुंभ’ संपन्न हो गया, लेकिन इस अवधि ने शासन की व्यवस्थाओं और दावों की पोल खोलकर रख दी है। जहाँ शासन ने बिचौलियों पर नकेल कसने के बड़े-बड़े दावे किए थे, वहीं ज़मीनी हकीकत इसके उलट रही। छाल क्षेत्र की समितियों और मंडियों में पुराना और ग्रीष्मकालीन धान खपाने के लिए बिचौलियों ने “बहती गंगा में हाथ धोने” का कोई अवसर नहीं छोड़ा, जिससे प्रशासन की रोकथाम की कवायद पूरी तरह विफल साबित हुई।

बिचौलियों का ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ का खेल

​इस वर्ष उत्पादन कम होने के बावजूद मंडियों में धान की आवक अंतिम समय तक बनी रही। किसानों ने अपने निर्धारित रकबे को पूरा करने के लिए खुले बाजार से सस्ते दामों पर धान खरीदकर समर्थन मूल्य पर खपाया। यद्यपि शासन ने पटवारियों की अनावरी रिपोर्ट के आधार पर खरीदी का प्रयास किया, लेकिन बिचौलिए शासन के हर चक्रव्यूह को भेदने में सफल रहे।

कुडेकला समिति: भ्रष्टाचार और मनमानी का केंद्र

​नियमों को दरकिनार कर कुडेकला समिति के सहायक प्रबंधक पर धान खरीदी में भारी हेर-फेर के आरोप लगे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ एक ओर सहायक प्रबंधक ठंडा राम बहेरा को निलंबित किया गया, वहीं इसी समिति के अन्य अधिकारियों की मनमानी बदस्तूर जारी है। क्षेत्र में चर्चा है कि जिनकी “सेटिंग” हो गई, वे चुप हैं और जिनकी नहीं हुई, उनकी शिकायतों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।

मामला 1: किसान वीरेंद्र राठिया से 50 हजार की मांग

​बेहरामार के किसान वीरेंद्र राठिया जब कुडेकला मंडी पहुँचे, तो उनके धान को अमानक बताकर कथित रूप से 50,000 रुपये की मांग की गई। किसान द्वारा असमर्थता जताने पर सौदा 15,000 में करने की कोशिश हुई। किसान ने तहसीलदार से न्याय की गुहार लगाई, लेकिन परिणाम चौंकाने वाला रहा। 404 कट्टा धान में से केवल 90 कट्टा खरीदा गया, 235 कट्टा जब्त कर लिया गया और शेष 79 कट्टा धान का कोई हिसाब नहीं है। सवाल यह है कि न्याय मांगने वाले किसान का धान किस आधार पर जब्त किया गया?

मामला 2: महिला कृषक समिति का संघर्ष

​गजईपाली की महिला कृषक समिति को भी भारी प्रताड़ना झेलनी पड़ी। 500 कट्टा धान में से 300 कट्टा को अमानक बताकर रिजेक्ट कर दिया गया और कथित रूप से ‘मोटी रकम’ की मांग की गई। जब मामला मंत्रालय और कलेक्टर तक पहुँचा, तो वही ‘अमानक’ धान अचानक ‘मानक’ हो गया और खरीद लिया गया। यह विरोधाभास भ्रष्टाचार की ओर सीधा इशारा करता है।

मिलर-मंडी गठजोड़ और ‘क्लीन चिट’ का खेल

​12 जनवरी को मंडी में एक ट्रैक्टर से धान सीधे मिलर के ट्रक में लोड करने का वीडियो वायरल हुआ था। साक्ष्य होने के बावजूद अधिकारियों ने केवल पंचनामा बनाकर औपचारिकता पूरी की और मामले को रफा-दफा कर दिया। सूत्रों का कहना है कि समिति में सहायक प्रबंधक के रिश्तेदारों और ग्रामीणों का वर्चस्व है, जिससे सच्चाई दबा दी जाती है।

“सैयां भए कोतवाल, तो डर काहे का”

मंडी में लगे CCTV कैमरे सबसे बड़े गवाह हैं। यदि निष्पक्ष जांच हो, तो कैमरों में बिचौलियों का जमावड़ा और किसानों का शोषण साफ देखा जा सकता है।

 

व्यवस्था की अन्य खामियाँ:

  • तौल में हेराफेरी: किसानों से 40.700 किग्रा की जगह 41.200 किग्रा धान लिया जा रहा है।
  • दोहरा भुगतान: किसान अपने साथ लेबर लेकर आते हैं, फिर भी उन्हें समिति के लेबरों को ‘भेंट’ देनी पड़ती है। बाद में समिति लेबर भुगतान का फर्जी बिल बनाकर शासन को चूना लगाती है।
  • बिचौलियों का नया चेहरा: शासन जिन्हें बिचौलिया कहता है, ग्रामीण क्षेत्रों में वे किसानों के ‘साहूकार’ की भूमिका में हैं, जो दुख-तकलीफ में कर्ज देते हैं और बदले में किसान के रकबे का उपयोग कर अपना धान खपाते हैं।

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