गणपत चौहान
छाल/रायगढ़। छाल तहसील के अंतर्गत ग्राम बहेरामार में इन दिनों भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। श्रीकृष्ण चंद्र भगवान एवं राधा रानी की असीम कृपा से आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दौरान पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा। भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बावजूद ग्रामीणों की आस्था डगमगाई नहीं और 04 अप्रैल को भव्य कलश यात्रा के साथ शुरू हुआ यह धार्मिक अनुष्ठान अब जनसैलाब का रूप ले चुका है।

व्यासपीठ से बही ज्ञान की धारा
कथा के मुख्य वक्ता, राष्ट्रीय भागवताचार्य पंडित रमाकांत जी महाराज ने अपनी संगीतय शैली और सरल छत्तीसगढ़ी व हिंदी भाषा में कथा का ऐसा रसपान कराया कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि ईश्वर को पाने के लिए घर-बार छोड़ना आवश्यक नहीं है, केवल मन को ईश्वर की ओर मोड़ना ही पर्याप्त है।
कथा के मुख्य पड़ाव: जन्म से लेकर बाल लीलाओं तक
- प्रारंभ: 04 अप्रैल को विधिवत कलश यात्रा के बाद कथा का शुभारंभ हुआ।
- 05-06 अप्रैल: महाभारत प्रसंग, राजा परीक्षित का श्राप, सुखदेव जी का आगमन और सती प्रसंग व ध्रुव चरित्र के माध्यम से भक्ति की शक्ति को बताया गया।
- 07-08 अप्रैल: वामन अवतार और राम अवतार के बाद श्रीकृष्ण जन्म की भव्य झांकी निकाली गई। गोवर्धन पूजा के प्रसंग में महाराज जी ने बताया कि कैसे कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर प्रभु ने इंद्र का अहंकार चूर किया और ब्रजवासियों की रक्षा की।
- 09 अप्रैल: रासलीला और कृष्ण-रुक्मणी के मंगल विवाह के प्रसंग ने भक्तों को उत्सव के माहौल में डुबो दिया।
हृदयस्पर्शी रहा सुदामा चरित्र
कथा के सबसे महत्वपूर्ण और मार्मिक प्रसंग ‘सुदामा चरित्र’ का वर्णन करते हुए पंडित रमाकांत महाराज ने बताया कि कृष्ण-सुदामा की मित्रता सांसारिक ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी से कोसों दूर है।
जब महाराज जी ने वर्णन किया कि कैसे श्रीकृष्ण ने अपने बचपन के सखा सुदामा के फटेहाल पैरों को अपने आंसुओं से धोया, तो पंडाल में उपस्थित हर आंख नम हो गई।
“देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये। पानी परात को छुयो नहीं, नैनन के जल सो पग धोये।”
महाराज जी ने कहा कि भगवान केवल प्रेम के भूखे हैं। सुदामा के दो मुट्ठी चावल खाकर प्रभु ने उन्हें तीनों लोकों की संपत्ति दान कर दी। यह प्रसंग सिखाता है कि विपत्ति में विचलित होने के बजाय परमात्मा पर विश्वास रखना ही सच्ची भक्ति है।
मृत्यु के भय से मुक्ति का मार्ग
राजा परीक्षित और सुखदेव जी के संवाद के माध्यम से महाराज जी ने जीवन का सबसे बड़ा दर्शन समझाया। उन्होंने कहा कि सात दिनों की यह यात्रा सभी के लिए सीख है। जिस तरह परीक्षित ने मृत्यु के भय को त्यागकर ‘अमरत्व’ (आत्मज्ञान) को चुना, उसी तरह हमें भी यह समझना चाहिए कि शरीर नश्वर है और आत्मा अजर-अमर है।
कलयुग में नाम संकीर्तन ही आधार
कथा के समापन सत्रों में यह संदेश दिया गया कि कलयुग में कठिन तपस्या संभव नहीं है, केवल भगवान का नाम लेना ही काफी है। श्रद्धा और एकाग्रता से सुनी गई कथा ही व्यक्ति को परम पद तक ले जा सकती है।
इस आयोजन में ग्राम बहेरामार सहित आसपास के क्षेत्रों से आए हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन भागवत गंगा में डुबकी लगा रहे हैं और इस आध्यात्मिक आयोजन ने गांव में भाईचारे और भक्ति का एक नया वातावरण निर्मित कर दिया है।