धरमजयगढ़ वन मंडल बना गजराजों का कब्रिस्तान? एक माह में तीसरी मौत से उठे गंभीर सवाल

– कुड़ेकेला-छाल क्षेत्र में फिर एक हाथी शावक की मौत, वन्यजीव प्रेमियों और ग्रामीणों में भारी आक्रोश

– करोड़ों के बजट और कागजी दावों के बीच जमीनी स्तर पर दम तोड़ रहा ‘हाथी संरक्षण प्रोजेक्ट’

– सुस्त मॉनिटरिंग, कमजोर सूचना तंत्र और डॉक्टरों की लेती-देती टीम पर खड़े हुए बड़े सवाल

धरमजयगढ़ / कुड़ेकेला। बुधराम अग्रवाल 

छत्तीसगढ़ का धरमजयगढ़ वन मंडल एक बार फिर वन्यजीव प्रेमियों के लिए मातम और चिंता का केंद्र बन गया है। कभी हाथियों के स्वच्छंद विचरण के लिए जाना जाने वाला यह पूरा इलाका अब धीरे-धीरे “गजराजों के कब्रिस्तान” में तब्दील होता जा रहा है। धरमजयगढ़ के कुड़ेकेला-छाल क्षेत्र में हाल ही में एक मासूम हाथी शावक (Elephant Calf) की दर्दनाक मौत का मामला सामने आया है। चौंकाने वाली और डराने वाली बात यह है कि पिछले महज एक महीने के भीतर यह तीसरी हाथी की मौत है। लगातार हो रही इन मौतों ने वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था, मॉनिटरिंग दावों और वन्यजीव संरक्षण की मंशा पर बेहद गंभीर और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या सुस्त पड़ गया है विभाग का ‘ट्रैकिंग और सूचना तंत्र’?

​हाथी शावक की मौत के बाद स्थानीय ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ग्राउंड जीरो से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, हाथियों के इस कॉरिडोर और मूवमेंट वाले क्षेत्रों में वन विभाग की जमीनी निगरानी (Monitoring) पूरी तरह से ढह चुकी है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि:

  • ​हाथियों की लोकेशन ट्रैक करने के लिए बनाया गया सूचना तंत्र (Information Network) केवल कागजों पर चल रहा है।
  • ​जब कोई हाथी बीमार, घायल या संकट में होता है, तो उसकी सूचना समय पर उच्च अधिकारियों या क्विक रिस्पांस टीम (QRT) तक पहुंच ही नहीं पाती।
  • ​यदि विभाग का निगरानी तंत्र सक्रिय होता, तो समय रहते बीमार या घायल हाथियों को बचाया जा सकता था।

कागजों पर करोड़ों का खर्च, धरातल पर दम तोड़ते गजराज

​मानव-हाथी द्वंद्व (Human-Elephant Conflict) को रोकने और हाथियों के संरक्षण के नाम पर हर साल सरकार द्वारा करोड़ों रुपए का बजट जारी किया जाता है। सोलर फेंसिंग, हाथी मित्र दल, जागरूकता अभियान और क्विक रेस्क्यू व्हीकल्स जैसी योजनाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन धरमजयगढ़ वन मंडल की वर्तमान स्थिति इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि:

​”करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, लेकिन जब धरातल पर किसी वन्यजीव को डॉक्टरों की या रेस्क्यू टीम की जरूरत होती है, तो घंटों तक कोई विशेषज्ञ मौके पर नहीं पहुंचता। लेत-लतीफी और प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा इन बेजुबान जीवों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ रहा है।”

 

विशेषज्ञों और रेस्क्यू टीम की टाइमिंग पर सवाल

​ग्रामीणों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के इस बेल्ट में मानव और हाथियों के बीच संघर्ष की घटनाएं नई नहीं हैं, लेकिन विभाग ने इससे कोई सबक नहीं सीखा। किसी भी आपातकालीन स्थिति में वन्यजीवों के उपचार के लिए जो त्वरित व्यवस्था होनी चाहिए, उसका पूरी तरह अभाव दिखता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम और रेस्क्यू अमला तब पहुंचता है, जब पानी सिर से ऊपर निकल चुका होता है। यही वजह है कि पिछले ३० दिनों के भीतर एक के बाद एक तीन हाथियों ने दम तोड़ दिया, जिसमें अब एक शावक भी शामिल हो गया है।

आखिर किसकी तय होगी जिम्मेदारी? उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज

​एक महीने में तीन बड़ी घटनाओं के बाद अब पूरे क्षेत्र में वन विभाग के खिलाफ माहौल गरमा गया है। वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है।

नागरिकों का सीधा सवाल है कि:

  1. ​लगातार हो रही इन मौतों के लिए आखिर वन मंडल के किस अधिकारी या बीट गार्ड की जिम्मेदारी तय होगी?
  2. ​क्या हर बार की तरह इस बार भी मामले को ‘स्वाभाविक मौत’ या ‘आपसी लड़ाई’ का नाम देकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

​अब देखना यह होगा कि इस लगातार हो रहे नुकसान के बाद भी वन विभाग की नींद टूटती है या धरमजयगढ़ के जंगलों से हाथियों की चीखें इसी तरह गायब होती रहेंगी। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि हाथियों की सुरक्षा के लिए पारदर्शी और प्रभावी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।

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