धरमजयगढ़ वनमंडल का छाल रेंज बना हाथियों का ‘डेथ जोन’, एक ही महीने में ३ मासूम शावकों की मौत से हड़कंप

– इत्तेफाक या लापरवाही का खूनी खेल? हर बार तालाब में डूबने (जल समाधि) से ही क्यों मर रहे हैं बेजुबान शावक?

– पुसलदा के तालाब में तैरता मिला हाथी शावक का शव, क्षेत्र में ५४ हाथियों का दल होने के बावजूद सोता रहा मैदानी अमला

– वर्तमान रेंजर का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में; पिछले कार्यकाल में ‘गणेश हाथी’ की करंट से मौत का लगा था दाग

कुड़ेकेला / धरमजयगढ़। बुधराम अग्रवाल 

छत्तीसगढ़ का धरमजयगढ़ वनमंडल और विशेष रूप से इसका ‘छाल रेंज’ इन दिनों हाथियों के लिए काल (डेथ जोन) साबित हो रहा है। वन्यजीव प्रेमियों, पर्यावरणविदों और स्थानीय ग्रामीणों के जेहन में इस वक्त एक ही सुलगता हुआ सवाल है—क्या छाल रेंज में हाथियों के मासूम शावकों की बैक-टू-बैक हो रही मौतें महज एक सामान्य ‘दुर्घटना’ हैं या फिर इसके पीछे वन विभाग की घोर लापरवाही, नाकामी और लचर कार्यप्रणाली की कोई बड़ी और काली कहानी छिपी है?

​यह सवाल इसलिए लाजमी और गंभीर हो गया है क्योंकि धरमजयगढ़ वनमंडल के अंतर्गत आने वाले सभी पांच रेंजों में से केवल और केवल ‘छाल रेंज’ में ही महीने भर के भीतर हाथी के शावक की मौत का यह तीसरा खौफनाक आंकड़ा सामने आया है। वन विभाग के मुस्तैदी और हाईटेक मॉनिटरिंग के तमाम दावों की धज्जियां उड़ाते हुए बीती रात फिर एक मासूम शावक की जान चली गई।

ताजा मामला: पुसलदा के तालाब में मिला शव, दल में थे ५४ हाथी

​मिली जानकारी के अनुसार, छाल रेंज के पुसलदा राजस्व भूमि पर स्थित बोट लाल की जमीन पर बने एक तालाब में बीती रात हाथी के शावक की डूबने से दर्दनाक मौत हो गई। बताया जा रहा है कि इस पूरे इलाके में पिछले कुछ दिनों से ५४ हाथियों का एक विशाल दल लगातार विचरण कर रहा है। इसी विचरण के दौरान यह दर्दनाक हादसा हुआ।

​शनिवार सुबह जब ग्रामीणों ने तालाब के पानी में शावक के मृत शरीर को तैरता हुआ देखा, तो पूरे वन अमले में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में छाल रेंज का अमला मौके पर पहुंचा और शावक के शव को पानी से बाहर निकलवाकर पोस्टमार्टम (PM) व आगे की विभागीय कागजी खानापूर्ति में जुट गया।

हर मौत की एक ही घिसी-पिटी थ्योरी: ‘तालाब में डूबने से मौत’

​वन विभाग की घोर लापरवाही और सुस्ती का इससे बड़ा और पुख्ता सबूत क्या होगा कि पिछले महज ३० दिनों के भीतर तीन मासूम शावकों की जान चली गई और विभागीय अफसरों के पास तीनों ही मौतों का एक ही रटा-रटाया कारण है—‘पानी में डूबने से मौत’। इस थ्योरी के सामने आते ही कई तीखे सवाल खड़े हो गए हैं:

  • ​यदि क्षेत्र में ५४ हाथियों का विशाल दल मूवमेंट कर रहा था, तो विभाग के तैनात हाथी मित्र दल, ट्रैकर और मैदानी अमला क्या गहरी नींद में सो रहा था?
  • ​जब दल तालाब के पास पहुंचा, तो शावक को दलदली या गहरे पानी में जाने से रोकने के लिए अलर्ट जारी क्यों नहीं किया गया?
  • ​एक ही रेंज के तालाब हाथियों के लिए ‘डेथ ट्रैप’ (मौत का कुआं) क्यों साबित हो रहे हैं? क्या इन खतरनाक और गहरे तालाबों की घेराबंदी (Fencing) या विशेष मॉनिटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी?

विवादों से पुराना नाता: रेंजर साहब का ट्रैक रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में

​इस पूरे खूनी खेल में वर्तमान वनपरिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक क्षमता पर उंगलियां उठनी शुरू हो गई हैं। विभागीय इतिहास गवाह है कि वर्तमान रेंजर जब पूर्व में भी इस सर्किल/रेंज में पदस्थ थे, तब भी हाथियों की अप्राकृतिक मौतों का एक लंबा और खौफनाक दौर देखने को मिला था।

याद है ‘गणेश हाथी’ का वो दौर?

यह वही दौर था जब छत्तीसगढ़ का मशहूर और विशालकाय ‘गणेश हाथी’ अपनी अनोखी आदतों के कारण देश-प्रदेश में अपनी अलग पहचान बना चुका था। उसकी सुरक्षा और मूवमेंट पर नजर रखने के लिए बकायदा सैटेलाइट/रेडियो कॉलर ट्रैकर मशीन लगाई गई थी और दूसरे राज्यों से बुलाए गए हाथी विशेषज्ञों की विशेष टीम चौबीस घंटे निगरानी करती थी। लेकिन अफ़सोस, इतने वीआईपी और नामी-गिरामी ‘गणेश हाथी’ ने भी इन्हीं रेंजर साहब के पिछले कार्यकाल के दौरान ही छाल क्षेत्र में अवैध बिजली तारों (करंट) की चपेट में आकर तड़प-तड़प कर दम तोड़ा था।

अधिकारी वही, लापरवाही वही: अब कौन लेगा इन मौतों की जिम्मेदारी?

​वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि छाल रेंज में इतिहास खुद को बेहद डरावने ढंग से दोहरा रहा है। वर्तमान रेंजर के दोबारा छाल रेंज की कमान संभालते ही हाथियों, खासकर उनके मासूम शावकों की मौत का सिलसिला अप्रत्याशित रूप से तेज हो गया है। एक ही महीने में तीन-तीन शावकों की ‘जल समाधि’ वन विभाग के वन्यजीव प्रबंधन की पूरी तरह से विफलता को उजागर करती है।

​अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार भी उच्च अधिकारी इस राष्ट्रीय क्षति को महज एक ‘दुर्घटना’ का नाम देकर रफा-दफा कर देंगे, या फिर कुंभकर्णी नींद में सोया वन विभाग का शीर्ष नेतृत्व जागेगा और डेथ जोन बन चुके छाल रेंज के जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस और दंडात्मक कार्रवाई करेगा? इलाके के ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों ने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों पर कार्रवाई और हाथियों की सुरक्षा के कड़े इंतजाम नहीं हुए, तो मामला कोर्ट तक घसीटा जाएगा।

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