धरमजयगढ़ में ‘हरा सोना’ बनाम ‘गजराज’: क्या इस बार जीत पाएगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था?

गनपत चौहान 

कुड़ेकेला/धरमजयगढ़। छत्तीसगढ़ के वनांचलों में ‘हरे सोने’ यानी तेंदूपत्ता संग्रहण का आगाज होने जा रहा है, लेकिन धरमजयगढ़ वनमंडल के लिए यह सीजन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। इस वर्ष ग्रामीण अर्थव्यवस्था और वन्यजीव संरक्षण के बीच एक बड़ा द्वंद्व खड़ा हो गया है। एक तरफ शासन ने संग्रहण का भारी-भरकम लक्ष्य रखा है, तो दूसरी तरफ जंगलों में डेरा जमाए हाथियों का विशाल कुनबा ग्रामीणों की राह रोके खड़ा है।

लक्ष्य बड़ा, खतरा उससे भी गहरा

​वन विभाग ने इस वर्ष धरमजयगढ़ वनमंडल के लिए 82,600 मानक बोरी तेंदूपत्ता संग्रहण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। ग्रामीणों के लिए यह साल भर की आजीविका का मुख्य आधार है। इसे जुटाने के लिए उन्हें कड़कड़ाती सुबह और अंधेरे में ही जंगलों की गहराई में उतरना पड़ता है। लेकिन इस बार चुनौती 92 हाथियों का वह कुनबा है, जो अलग-अलग रेंजों में सक्रिय है।

रेंज वार हाथियों की मौजूदगी: विभाग की बढ़ी नींद

​ताजा आंकड़ों के मुताबिक, क्षेत्र में नर, मादा और शावक हाथियों की संख्या अब शतक के करीब (92) पहुंच चुकी है। इनका वितरण कुछ इस प्रकार है:

  • धरमजयगढ़ रेंज: आमगांव (15), चैनपुर (15), पोटिया (01), रूपुनगा (01) और कोयलार (01) में हाथियों का विचरण जारी है।
  • छाल रेंज: बोजिया, बेहरामार, पुरूँगा और कुड़ेकेला में कुल 24 हाथी सक्रिय हैं, जिनमें से अकेले पुरूँगा के जंगलों में 14 हाथियों का दल मौजूद है।
  • कापू, बोरो और बाकरूमा: यहाँ नर-मादा और शावकों समेत कुल 35 हाथियों की मौजूदगी दर्ज की गई है।

अस्तित्व की लड़ाई: पेट की आग बनाम गजराज का खौफ

​तेंदूपत्ता संग्रहण केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि इन ग्रामीणों के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। वन विभाग ने सख्त हिदायत दी है कि ग्रामीण पर्याप्त रोशनी के बिना जंगल न जाएं और हाथियों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों से बचें। लेकिन सवाल यह है कि यदि ग्रामीण जंगल के भीतर नहीं जाएंगे, तो ‘हरा सोना’ कैसे आएगा?

​ग्रामीणों के बीच अब यह चिंता आम है कि क्या प्रशासन सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम करेगा। हाथियों के पल-पल बदलते लोकेशन के बीच हजारों ग्रामीणों का जंगल में प्रवेश करना जान जोखिम में डालने जैसा है।

दशकों का रहवास और ‘तूफान से पहले की शांति’

​राहत की बात सिर्फ इतनी है कि पिछले कुछ समय से हाथी-मानव द्वंद्व की घटनाओं में एक मौन विराम लगा है। धरमजयगढ़ का भूगोल दशकों से हाथियों के लिए अनुकूल रहा है, जिससे वे यहाँ स्थायी प्रवास कर रहे हैं। जानकार इसे ‘तूफान से पहले की शांति’ के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि संग्रहण शुरू होते ही जंगलों में इंसानी दखल बढ़ेगा।

क्या है प्रशासन का प्लान-B?

​92 हाथियों की चुनौती और 82,600 बोरी के लक्ष्य के बीच तालमेल बिठाना वन विभाग के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ग्रामीणों की मांग है कि संग्रहण केंद्रों पर सुरक्षा और निगरानी की विशेष व्यवस्था की जाए।

​अब देखना यह होगा कि वन विभाग और जिला प्रशासन इस सीजन में ग्रामीणों की जान और उनकी अर्थव्यवस्था—दोनों को सुरक्षित रख पाने में कितना सफल हो पाता है।

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