कुड़ेकेला/धरमजयगढ़/ बुधराम अग्रवाल/एक तरफ सरकारें और वन विभाग पर्यावरण संतुलन बनाए रखने और हरियाली बढ़ाने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खुद विभाग के जिम्मेदार अधिकारी बने-बनाए जंगलों को उजाड़ने में लगे हैं। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का दम भरने वाले वन विभाग का एक ऐसा कारनामा वनमंडल धरमजयगढ़ के छाल वन परिक्षेत्र से सामने आया है, जहाँ खुद विभाग ने ही जंगलों की हरियाली पर कुल्हाड़ी चला दी है। छाल वन परिक्षेत्र में पानी संग्रहण के लिए तालाब निर्माण के नाम पर दर्जनों लहलहाते हरे-भरे पेड़ों को बेरहमी से काट दिया गया है। जल संरक्षण की आड़ में हरियाली का यह कत्लेआम देखकर स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
सैकड़ों हेक्टेयर का जंगल, फिर भी पेड़ काटने की क्या थी मजबूरी?
छाल वन परिक्षेत्र का यह पूरा इलाका ‘प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट’ (संरक्षित वन) के अंतर्गत आता है, जो सैकड़ों हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। अब इस पूरे मामले को लेकर विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या इतने बड़े विशाल वन क्षेत्र में विभाग के अधिकारियों को एक भी ऐसी खाली या बंजर जगह नहीं मिली, जहाँ पेड़ों को काटे बिना तालाब का निर्माण किया जा सकता था? क्या विभाग की नजरों में इन हरे-भरे पेड़ों की कोई कीमत नहीं थी, जो बिना सोचे-समझे इन्हें चंद घंटों में जमींदोज कर दिया गया? दशकों में तैयार हुए इन पेड़ों को काटने से पहले क्या किसी वैकल्पिक स्थान की तलाश की गई थी?
बजट बचाने का ‘शॉर्टकट’ या भ्रष्टाचार का नया खेल?
इस पूरे संवेदनशील मामले में जब वन विभाग की कार्यप्रणाली के जानकारों से राय ली गई, तो एक बेहद चौंकाने वाली वजह सामने आई। जानकारों का कहना है कि वन विभाग अक्सर ऐसे निर्माण कार्यों में लापरवाही भरा ‘शॉर्टकट’ अपनाता है।
विभाग जानबूझकर जंगल के भीतर ऐसी जगहों का चयन करता है जो पहले से ही प्राकृतिक रूप से गहरी या ढलान वाली हों। ऐसी जगहों पर केवल एक तरफ मिट्टी की मेढ़ (पार) बनाकर बहुत ही कम समय और बेहद कम लागत में तालाब का आकार दे दिया जाता है। इस लागत को बचाने और कागजों पर कम खर्च दिखाने के चक्कर में जिम्मेदार अधिकारी यह पूरी तरह भूल जाते हैं कि जो पेड़ दशकों की देखरेख के बाद बड़े हुए हैं, उन्हें चंद घंटों में काटकर फेंक दिया गया।
सरकारी फाइलों में बचत, पर्यावरण को भारी नुकसान
इस ‘शॉर्टकट’ के जरिए भले ही सरकारी फाइलों में बजट की कथित बचत या कम लागत में काम पूरा होना दिखा दिया जाए, लेकिन पर्यावरण की जो अपूरणीय क्षति हुई है, उसका हिसाब कौन देगा? पानी सहेजने के नाम पर जीवनदायिनी ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों की हत्या करना किसी भी दृष्टिकोण से समझदारी भरा कदम नहीं माना जा सकता।
क्षेत्र के पर्यावरण प्रेमियों और ग्रामीणों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अब देखना यह होगा कि इस गंभीर मामले के उजागर होने के बाद वन विभाग के उच्च अधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं, या फिर कम लागत में काम दिखाने का हरियाली से खिलवाड़ का यह खेल ऐसे ही बेधड़क चलता रहेगा।