देवउठनी ग्यारस, किसान का मन उदास
लोकेंद्र सिंह शेखावत •
जयपुर। देवउठनी ग्यारस की शादियों पर इस बार किसानों के चेहरों पर मुस्कान की जगह उदासी देखने को मिली। गले की खुंआली, हंसली, सिर की रखड़ी, हाथ की बंगड़ी, पूंछी, गोखरूं, पांव की कड़ियां और टणका तक खरीदना किसानों के लिए संभव नहीं हो पाया। अतिवृष्टि ने उनकी आर्थिक स्थिति को इस कदर प्रभावित किया कि इस शुभ अवसर पर भी वे अपने पारंपरिक गहने और कपड़े नहीं खरीद सके।
राजस्थान में अतिवृष्टि का लेखा-जोखा अभी जारी ही था कि देवउठनी एकादशी पर हजारों गांवों में शादियों का सिलसिला शुरू हो गया। प्रदेश के 55 हजार गांवों और असंख्य ढाणियों में जहां हर वर्ष चहल-पहल रहती है, वहां इस बार सन्नाटा नजर आया। गत वर्ष जहां करीब 6 लाख किलोग्राम चांदी की बिक्री हुई थी, वहीं इस वर्ष यह घटकर महज 1.5 लाख किलोग्राम रह गई। इसका मुख्य कारण अतिवृष्टि से फसल का खराब होना और चांदी के बढ़े हुए दाम रहे।
फसल खराब होने के कारण किसानों के हाथ से उनकी मेहनत की कमाई फिसल गई। शादी-ब्याह में खर्च करने के बजाय उनकी पहली प्राथमिकता बैंकों का ऋण चुकाना बन गई।
राजस्थान में खरीफ सीजन में 50 लाख टन बाजरा, 22 लाख टन मक्का, 5 लाख टन ज्वार, 16 लाख टन मूंग, 4 लाख टन मोठ, 1.70 लाख टन उड़द, 50 हजार टन चौला और 24 लाख टन मूंगफली की पैदावार हुई थी, लेकिन अतिवृष्टि ने 50 से 95 प्रतिशत तक की फसलों को नुकसान पहुंचाया। बाजरा, ज्वार और मक्का का 60 प्रतिशत हिस्सा कैटल फीड में चला गया।
दलहन फसलों के भावों में भी भारी गिरावट आई। मूंग का भाव नीचे में 2 हजार और ऊपर में 8 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक रहा, लेकिन खराब फसल के कारण इसका अनुपात 60-40 प्रतिशत का हो गया। यही हाल तुअर, उड़द और मोठ की दाल का भी रहा। बीकानेर का प्रसिद्ध पापड़ और मंगोड़ी उद्योग भी मोठ की खराब फसल की वजह से संकट में है।
राजस्थान खाद्य पदार्थ व्यापार संघ के चेयरमैन बाबूलाल गुप्ता के अनुसार, किसान की चार प्रमुख प्राथमिकताएं होती हैं— सबसे पहले शादी-ब्याह में खर्च, दूसरी बीजों और उधारी का भुगतान, तीसरी घर-परिवार के कपड़े खरीदना और चौथी बच्चों की शिक्षा पर खर्च। मगर इस बार फसल खराब होने के कारण उसे सबसे पहले कर्ज और शिक्षा का भुगतान करना पड़ा, जबकि शादियों में कटौती करनी पड़ी।
कहीं खेतों में पानी भरा है, कहीं फसल आड़ी पड़कर सड़ गई, तो कहीं तूफान ने तैयार फसल को तबाह कर दिया। परिणामस्वरूप इस बार किसान न तो अपनी बेटियों के गले में हंसली और बोरला पहना पाए, न ही घर की औरतों के लिए लूगड़ी, पोमचा या पीला खरीद सके।
देवउठनी एकादशी, जो आमतौर पर उल्लास और समृद्धि का प्रतीक होती है, इस बार किसानों के लिए उदासी और असहायता की कहानी बन गई — एक उदासीन एकादशी।