अलवर | नरेश गुनानी
राजऋषि भर्तृहरि की तपोभूमि पर स्थित मत्स्य विश्वविद्यालय का छठा दीक्षांत समारोह केवल उपाधि वितरण का आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह भावी भारत की नींव रखने वाले ‘आत्मनिर्भर युवाओं’ के संकल्प का गवाह बना। राज्यपाल और कुलाधिपति हरिभाऊ बागडे ने शिक्षा को व्यवहार और चरित्र से जोड़ते हुए विद्यार्थियों को समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियों का बोध कराया।
मुख्य संदेश: डिग्री से आगे बढ़कर व्यक्तित्व निर्माण
राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल पाठ्यपुस्तकें पढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनका मुख्य केंद्र बौद्धिक क्षमता और समग्र व्यक्तित्व विकास होना चाहिए।
”शिक्षा वही सार्थक है, जो जीवन व्यवहार का मार्ग प्रशस्त करे। किताबी ज्ञान को जब तक व्यवहार में नहीं उतारा जाता, वह पूर्ण नहीं होता।” — हरिभाऊ बागडे
शिक्षा के पांच स्तंभ और आत्मनिर्भरता
समारोह के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को देश के कायाकल्प का आधार बताया गया। राज्यपाल ने उन पांच आधारभूत स्तंभों का उल्लेख किया जिन पर हमारी आधुनिक शिक्षा टिकी है:
- एक्सेस (पहुँच): शिक्षा तक हर वर्ग की आसान पहुँच।
- इक्विटी (समता): अवसर की समानता।
- क्वालिटी (गुणवत्ता): वैश्विक मानकों पर खरी शिक्षा।
- अफोर्डेबिलिटी (वहनीयता): सस्ती और सुलभ शिक्षा।
- अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही): संस्थानों की जिम्मेदारी।
समारोह के महत्वपूर्ण पड़ाव
प्रताप ऑडिटोरियम में आयोजित इस भव्य समारोह में शैक्षणिक उत्कृष्टता को पदक और उपाधियों से नवाजा गया:
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उपलब्धि |
विवरण |
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कुल उपलब्ध डिग्रियां |
44,293 |
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पीएचडी शोधार्थी |
40 |
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स्वर्ण पदक विजेता |
42 |
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कुलाधिपति पदक |
01 (सर्वोच्च सम्मान) |
बेटियों की बढ़ती धमक
समारोह का एक सबसे प्रेरणादायक पहलू पदक विजेताओं में छात्राओं की बहुलता रही। राज्यपाल ने इसे सामाजिक बदलाव का बड़ा संकेत माना। शोध, सेवा और नेतृत्व के क्षेत्रों में बेटियों की यह बढ़त एक विकसित और संतुलित समाज की परिचायक है।
प्रशासन को चेतावनी: शुचिता से कोई समझौता नहीं
राज्यपाल ने कुलगुरुओं को सख्त हिदायत दी कि विश्वविद्यालयों की गुडविल और गुणवत्ता पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए। उन्होंने नियम-विरुद्ध कार्यों पर शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाते हुए कड़ी कार्रवाई का संकेत दिया।
ऐतिहासिक संदर्भ और सुधार
समारोह में विनोबा भावे के विचारों का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने मैकाले की शिक्षा पद्धति के स्थान पर भारतीय मूल्यों वाली शिक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ईमानदारी, परिश्रम और नैतिकता ही वे मूल्य हैं जो एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करेंगे।
