डीआरडीओ और आज़ाद इंजीनियरिंग ने बनाया भारत का पहला स्वदेशी 350 किग्रा थ्रस्ट एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन; रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बड़ी छलांग

गौरव कोचर 

​भारत ने रक्षा तकनीक और स्वदेशी विनिर्माण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की बेंगलुरु स्थित प्रयोगशाला, गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने निजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी ‘आज़ाद इंजीनियरिंग’ के साथ मिलकर देश का पहला 350 किलोग्राम थ्रस्ट-क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन सफलतापूर्वक विकसित और निर्मित कर लिया है।

​यह उपलब्धि भारतीय वायुसेना और रक्षा बलों की आधुनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को एक नई ऊँचाई पर ले जाने में मील का पत्थर साबित होगी।

भारत ने पहला स्वदेशी एक्सपेंडेबल टर्बो जेट इंजन सफलतापूर्वक विकसित किया (फोटो-DRDO)

क्या है इस टर्बोजेट इंजन की खासियत?

  1. विशेष रूप से मिसाइल और ड्रोन के लिए डिज़ाइन: यह एक्सपेंडेबल (एकल-उपयोग/सटीक प्रहार) टर्बोजेट इंजन मुख्य रूप से क्रूज़ मिसाइलों, जेट-पावर्ड ड्रोन, मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) और एरियल टारगेट्स के लिए तैयार किया गया है।
  2. हाई-स्पीड और लॉन्ग-रेंज क्षमता: 350 किग्रा थ्रस्ट क्षमता वाला यह इंजन मिसाइलों और ड्रोन को उच्च गति (High-Subsonic Speed) और लंबी दूरी तक सटीक प्रहार करने की शक्ति प्रदान करता है।
  3. कम लागत में बेहतर दक्षता: ‘एक्सपेंडेबल’ श्रेणी के कारण इसे इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि यह निर्माण लागत में किफ़ायती होने के साथ-साथ अत्यंत जटिल और कठिन अभियानों में शत-प्रतिशत विश्वसनीयता प्रदान करता है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP Model) की मिसाल

​इस इंजन का सफल विकास रक्षा तकनीक में सरकारी अनुसंधान संगठन (DRDO) और निजी उद्योग के समन्वय की एक अनूठी मिसाल है। GTRE द्वारा डिज़ाइन और विकसित किए गए इस इंजन के जटिल घटकों (complex rotating components) का निर्माण और असेंबली हैदराबाद स्थित आज़ाद इंजीनियरिंग द्वारा की गई है।

​रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस साझेदारी से न केवल रक्षा उत्पादन की गति में तेज़ी आएगी, बल्कि भविष्य में विदेशी इंजनों और घटकों पर भारत की निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।

सामरिक महत्व: भारत के लिए क्यों है ‘गेम-चेंजर’?

  • विदेशी निर्भरता का अंत: अब तक भारत को इस श्रेणी के छोटे टर्बोजेट इंजनों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता था। स्वदेशी इंजन बनने से आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पर बाहरी दबाव समाप्त होगा।
  • भविष्य के ड्रोन और मिसाइल कार्यक्रमों को बल: यह टर्बोजेट इंजन भारत की अगली पीढ़ी की क्रूज़ मिसाइलों और एआई-संचालित (AI-powered) जेट ड्रोन प्रणालियों का मुख्य शक्ति स्रोत बनेगा।
  • निर्यात की संभावनाएँ: भारत न केवल अपनी रणनीतिक ज़रूरतों को पूरा करेगा, बल्कि मित्र देशों को उन्नत रक्षा प्रणालियों का निर्यात करने की स्थिति में भी मजबूत होगा।
  1. ​350 किग्रा थ्रस्ट टर्बोजेट इंजन का सफल विकास यह सिद्ध करता है कि भारत अब एयरो-इंजन तकनीक के सबसे जटिल और आधुनिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। डीआरडीओ और आज़ाद इंजीनियरिंग का यह संयुक्त प्रयास आने वाले समय में भारतीय सशस्त्र बलों की परिचालन तैयारियों को अत्यधिक मजबूती प्रदान करेगा।

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