सरकारी विज्ञापनों की ‘घर-घर सेवा’ दावों की खुली पोल; भीषण गर्मी में 5 किलोमीटर पथरीला रास्ता पार कर ‘जिंदा’ होने का सबूत देने पहुंची वृद्धा
गनपत चौहान
मैनपाट (सरगुजा)। छत्तीसगढ़ के ‘शिमला’ कहे जाने वाले मैनपाट से सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर ने देश के डिजिटल विकास और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। यह तस्वीर साबित करती है कि कागजों और विज्ञापनों में दौड़ रहा ‘डिजिटल इंडिया’ आज भी देश के सुदूर आदिवासी अंचलों के पहाड़ों, नालों और पथरीले रास्तों को पार नहीं कर पाया है। यहाँ एक 90 वर्ष की बुजुर्ग महिला को केवल यह साबित करने के लिए कि “वह अभी जीवित है”, उसकी बहू को उसे अपनी पीठ पर लादकर कई किलोमीटर दूर स्थित बैंक तक ले जाना पड़ा।
सरकारी महकमों में इसे ‘जीवन प्रमाण पत्र’ (Life Certificate) या ‘फिजिकल वेरिफिकेशन’ कहा जाता है, लेकिन जमीनी हालात को देखकर स्थानीय ग्रामीण इसे ‘जिंदगी का अपमान पत्र’ कह रहे हैं।
43 डिग्री की झुलसाती गर्मी और 5 किलोमीटर का सफर
मामला मैनपाट के एक सुदूर पहाड़ी गांव का है। क्षेत्र में इन दिनों पारा 43 डिग्री के पार पहुंच चुका है। चिलचिलाती धूप और झुलसाती गर्मी के बीच एक असहाय बुजुर्ग महिला, जो चलने-फिरने में पूरी तरह अक्षम है, उसे उसकी बहू ने अपनी पीठ पर बैठाया। रास्ते में पड़ने वाले पहाड़, बरसाती नाले और नुकीले पत्थरों को पार करते हुए बहू करीब 5 किलोमीटर का सफर तय कर बैंक की चौखट पर पहुंची।
यमराज से मिली ‘अस्थायी जमानत’ जैसी पेंशन
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, जब बहू अपनी सास को पीठ पर लादकर हांफते हुए बैंक पहुंची, तब बैंक अधिकारी ने बाहर आकर बुजुर्ग महिला को देखा। महिला की सांसें चलती पाकर कागजी औपचारिकताएं पूरी की गईं और यह तय हुआ कि हां, इन्हें अगले कुछ महीनों के लिए पेंशन दी जा सकती है। बैंक के इस रवैये को देखकर वहां मौजूद लोग भावुक भी हुए और व्यवस्था के प्रति उनमें आक्रोश भी दिखा।
तकनीक आसमान में, बुजुर्ग आज भी कंधों पर
एक तरफ देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन डिलीवरी, ऑनलाइन केवाईसी (KYC) और ‘फेस ऑथेंटिकेशन’ (चेहरे से पहचान) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का डंका बजाया जा रहा है। सरकारें दावा करती हैं कि बुजुर्गों और दिव्यांगों को घर बैठे सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। मंत्री और अधिकारी सोशल मीडिया पर एक क्लिक से जनसमस्याओं का समाधान करने का दावा करते हैं।
लेकिन इस घटना ने व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- विज्ञापनों तक सीमित सुविधाएं: क्या ‘घर-घर सेवा’ और ‘बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट’ (बैंक मित्र) जैसी योजनाएं सिर्फ शहरों या विज्ञापनों तक ही सीमित हैं?
- असंवेदनशील नियम: क्या अत्यधिक वृद्ध, बीमार और चलने में असमर्थ लोगों के लिए कोई वैकल्पिक और मानवीय तरीका नहीं अपनाया जा सकता?
- सिस्टम का बोझ: जिस महिला ने अपनी पूरी जिंदगी इस देश और परिवार को संवारने में लगा दी, बुढ़ापे के आखिरी पड़ाव पर उसे और उसके परिवार को चंद रुपयों की पेंशन के लिए सिस्टम का यह क्रूर बोझ ढोना पड़ रहा है।
ग्रामीणों में आक्रोश, सुधारे जाएं नियम
इस वाकये के सामने आने के बाद स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि सुदूर वनांचलों में रहने वाले अति-बुजुर्गों के अंगूठे के निशान या बायोमेट्रिक सत्यापन के लिए बैंक कर्मी या पंचायत प्रतिनिधि खुद उनके घर जाएं। अगर कोई चलने में असमर्थ है, तो उसे इस तरह घसीटकर या पीठ पर लादकर बैंक लाना मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है।
फिलहाल, यह तस्वीर डिजिटल क्रांति के इस दौर में नीति-निर्माताओं को आईना दिखा रही है कि जब तक तकनीक का लाभ कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति तक सम्मानजनक तरीके से नहीं पहुंचता, तब तक ‘विश्वगुरु’ और ‘डिजिटल लीडर’ होने के दावे अधूरे हैं।