खेत में डबरी, जीवन में खुशहाली : मनरेगा योजना से बीजापुर के किसान की आय में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
रायपुर, 03 जून 2026 | गनपत चौहान
छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसानों की तकदीर बदलने में मील का पत्थर साबित हो रही है। योजना के तहत निर्मित डबरियां (छोटे तालाब) अब बीजापुर जिले के किसानों के लिए न केवल जल संरक्षण का माध्यम बनी हैं, बल्कि आय बढ़ाने और खेती को बहुआयामी रूप देने का एक प्रभावी जरिया बन चुकी हैं। सिंचाई सुविधा और अतिरिक्त रोजगार के उद्देश्य से बनाई जा रही इन डबरियों से वनांचल के किसानों के जीवन में क्रांतिकारी और सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल रहा है।
जनपद पंचायत भोपालपटनम की ग्राम पंचायत चेरपल्ली के किसान वासम अब्बैया इसका एक जीवंत और प्रेरक उदाहरण बनकर उभरे हैं। उनकी इस अनुकरणीय सफलता की सराहना वन एवं जिले के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने भी की है और इसे ग्रामीण विकास का एक बेहतरीन मॉडल बताया है।
मनरेगा से मिली डबरी, बदली खेती की सूरत
बीजापुर जिले के चेरपल्ली गांव के रहने वाले वासम अब्बैया के पास करीब 2 एकड़ कृषि भूमि है। सिंचाई के पर्याप्त साधन न होने के कारण पहले वे केवल वर्षा आधारित खेती पर ही निर्भर थे, जिससे साल में बमुश्किल एक ही फसल मिल पाती थी। वित्तीय वर्ष 2023-24 में प्रशासन द्वारा उनकी निजी भूमि पर मनरेगा के तहत डबरी निर्माण की स्वीकृति दी गई।
कुल 2.25 लाख रुपये की लागत से इस डबरी का निर्माण कराया गया। इस विकास कार्य से न केवल वासम अब्बैया को लाभ हुआ, बल्कि गांव के अन्य ग्रामीणों को भी रोजगार मिला। इस निर्माण कार्य के दौरान कुल 993 मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ, जिससे गांव के 104 जॉब कार्डधारी परिवारों को सीधे तौर पर काम और मजदूरी मिली।
मत्स्य पालन से हुई बंपर अतिरिक्त कमाई
डबरी का निर्माण पूरा होने के बाद उसमें पानी का ठहराव शुरू हुआ, तो वासम अब्बैया ने इसका पारंपरिक खेती से हटकर लीक से जुदा इस्तेमाल करने का फैसला किया। उन्होंने मत्स्य पालन विभाग के सहयोग और मार्गदर्शन से डबरी में मछली पालन शुरू किया।
- पहली खेप की सफलता: पहली बार में उन्होंने लगभग 20 किलोग्राम मछली बेचकर करीब 35,000 रुपये की शुद्ध अतिरिक्त आय अर्जित की।
- भविष्य की योजना: इस शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर वर्तमान में उन्होंने डबरी में 40 किलोग्राम मछली बीज (फिंगरिंग्स) डाला है। पानी की अच्छी उपलब्धता को देखते हुए आने वाले समय में उन्हें इससे और अधिक बंपर आमदनी होने की उम्मीद है।
सब्जी उत्पादन से मिला दोहरा लाभ
वासम अब्बैया ने केवल जल के भीतर ही नहीं, बल्कि उसके आसपास की जमीन का भी कुशल प्रबंधन किया। उन्होंने डबरी के मेढ़ों और किनारों की खाली पड़ी नमी युक्त भूमि पर सब्जी उत्पादन की शुरुआत की। उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से सेमी, बरबट्टी (बोड़ा) और लौकी जैसी नकदी और हरी सब्जियों की खेती की। इन ताजी सब्जियों को स्थानीय बाजारों में बेचने से उन्हें लगभग 40,000 रुपये का अतिरिक्त मुनाफा हुआ। इस दोहरे मॉडल (मछली + सब्जी) ने उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
सिंचाई सुविधा से पहली बार संभव हुई दोहरी फसल
इस डबरी का सबसे बड़ा तकनीकी और कृषि लाभ यह हुआ कि इसमें वर्षभर पानी उपलब्ध रहता है। इसके कारण वासम अब्बैया की पूरी 2 एकड़ कृषि भूमि में नियमित और सुचारू सिंचाई सुनिश्चित हो गई है। सिंचाई की स्थायी व्यवस्था होने से वे अपने जीवन में पहली बार दोहरी (रबी और खरीफ) फसल लेने में सफल हुए हैं। इससे उनके खेत की उत्पादकता तो बढ़ी ही है, साथ ही मुख्य फसल से होने वाली आय में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
आजीविका का सशक्त और टिकाऊ साधन
ग्राम पंचायत की रोजगार सहायक कु. रीता यालम के अनुसार:
”मनरेगा के तहत निर्मित डबरियां ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के साथ-साथ किसानों के लिए आजीविका का एक सशक्त और दीर्घकालिक माध्यम बन रही हैं। इनसे भू-जल स्तर में सुधार तो हो ही रहा है, साथ ही मत्स्य पालन और सब्जी उत्पादन जैसी सहायक गतिविधियों से किसानों को हर महीने नकद आय हो रही है, जिससे उनकी बाजार पर निर्भरता कम हुई है।”
ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल
बीजापुर जैसे दूरस्थ और संवेदनशील जिले में डबरी निर्माण के कार्य जल संरक्षण, रोजगार सृजन और टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। किसान वासम अब्बैया की यह सफलता कहानी यह साबित करती है कि यदि सरकारी योजनाओं का जमीनी स्तर पर सही क्रियान्वयन किया जाए, तो मनरेगा के तहत निर्मित संपत्तियां ग्रामीण आबादी को आत्मनिर्भर बनाने और उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में सबसे प्रभावी हथियार साबित हो सकती हैं।