टीएमसी में होने जा रही है देश की सबसे बड़ी टूट? 50 विधायकों के दावों और ‘सिंबल संकट’ का पूरा सच

गौरव कोचर 

कोलकाता | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने पहले ही राज्य की राजनीति को पूरी तरह पलट दिया था, लेकिन अब जो खबरें आ रही हैं, वे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रही हैं। राजनीतिक हलकों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि टीएमसी के करीब 50 विधायक बगावत का झंडा बुलंद कर पार्टी से अलग होने का मन बना रहे हैं।

​इस संभावित बगावत ने दो सबसे बड़े कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़े कर दिए हैं:

  1. क्या इन 50 विधायकों की सदस्यता बचेगी?
  2. क्या ममता बनर्जी से उनकी पार्टी का नाम और ‘जोड़ा फूल’ सिंबल छिन जाएगा?

​इन सवालों को समझने के लिए हमें बंगाल विधानसभा के वर्तमान आंकड़ों और देश के दलबदल विरोधी कानून के तकनीकी पहलुओं को गहराई से देखना होगा।

 पहला पहलू: बंगाल विधानसभा की मौजूदा तस्वीर (जून 2026)

​हाल ही में (अप्रैल-मई 2026) संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद सदन की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। टीएमसी अब 2021 वाले 215 विधायकों के विशाल बहुमत में नहीं है, बल्कि वह सत्ता से बाहर होकर विपक्ष में बैठ चुकी है। वर्तमान दलीय स्थिति इस प्रकार है:

राजनीतिक दल

विधानसभा में सीटें (2026 नतीजे)

सदन में वर्तमान भूमिका

भारतीय जनता पार्टी (BJP)

207

सत्ताधारी दल (पूर्ण बहुमत)

तृणमूल कांग्रेस (TMC)

80

मुख्य विपक्षी दल

कांग्रेस (INC)

02

अन्य विपक्षी

अन्य / निर्दलीय / वामदल

05

अन्य

कुल सीटें

294

दूसरा पहलू: 80 विधायकों वाली TMC पर कैसे लागू होगा ‘दलबदल कानून’?

​भारत के संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के मुताबिक, किसी भी दल में होने वाली टूट को कानूनी मान्यता तभी मिलती है जब अलग होने वाला धड़ा मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) विधायकों का समर्थन हासिल कर ले। यदि संख्या दो-तिहाई से एक भी कम रही, तो अलग होने वाले सभी विधायकों की सदस्यता रद्द (Disqualify) हो जाती है।

​वर्तमान में टीएमसी के पास केवल 80 विधायक हैं। इस आंकड़े के लिहाज से दलबदल का गणित पूरी तरह बदल जाता है:

  • कानूनी रूप से बचने के लिए जरूरी संख्या: 80 \times \frac{2}{3} = 53.33 यानी कम से कम 54 विधायक
  • 50 विधायकों की बगावत का नतीजा: यदि दावों के मुताबिक केवल 50 विधायक ही अलग होते हैं, तो यह आंकड़ा कानूनी जादुई संख्या (54) से 4 विधायक कम रह जाएगा। ऐसी स्थिति में विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) दलबदल कानून के तहत इन सभी 50 विधायकों को अयोग्य घोषित कर सकते हैं।

​ तीसरा पहलू: क्या छिन जाएगा पार्टी का नाम और सिंबल?

​यदि यह मान लिया जाए कि बागी गुट अपनी संख्या 54 या उससे पार (दो-तिहाई से अधिक) ले जाने में सफल रहता है, तब असली लड़ाई चुनाव आयोग (Election Commission of India) के पाले में जाएगी। महाराष्ट्र के ‘शिवसेना’ और ‘एनसीपी’ विवाद की तरह यहां भी ‘सिंबल और नाम’ की जंग छिड़ेगी।

​चुनाव आयोग ‘इलेक्शन सिम्बल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968’ के तहत फैसला करता है, जिसके दो मुख्य पैमाने हैं:

​1. विधायी बहुमत (Legislative Test)

​चुनाव आयोग देखता है कि सदन (विधानसभा और संसद) में किस गुट के पास ज्यादा निर्वाचित प्रतिनिधि हैं।

  • ​टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से यदि 50 से अधिक विधायक (जो कि कुल संख्या का आधे से अधिक यानी 62% है) ममता बनर्जी का साथ छोड़ देते हैं, तो बागी धड़ा विधायिका में खुद को ‘असली टीएमसी’ साबित करने के बेहद करीब पहुंच जाएगा।

​2. संगठनात्मक बहुमत (Organizational Test)

​सिर्फ विधायकों का टूटना काफी नहीं होता। चुनाव आयोग यह भी जांचेगा कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, प्रदेश कमेटियों और जमीनी पदाधिकारियों में किसके पास बहुमत है। चूंकि ममता बनर्जी टीएमसी की सर्वोच्च संस्थापक हैं और संगठन पर उनकी पकड़ बेहद मजबूत है, इसलिए संगठन के मोर्चे पर बागियों के लिए चुनौती बहुत बड़ी होगी।

विशेषज्ञों की राय: यदि बागी धड़ा 54 से ज्यादा विधायकों के साथ अलग होता है, तो चुनाव आयोग अंतरिम व्यवस्था के तहत टीएमसी का नाम और ‘जोड़ा फूल’ सिंबल फ्रीज (जब्त) कर सकता है और दोनों गुटों को नए नाम और अस्थाई सिंबल अलॉट किए जा सकते हैं। यानी ममता बनर्जी के हाथ से उनकी पार्टी की पहचान छिनने का वास्तविक खतरा इस बार बहुत बड़ा है।

 

​ चौथा पहलू: इस अंदरूनी कलह की असली वजह क्या है?

​राजनीतिक विश्लेषकों और टीएमसी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, 2026 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर ‘ओल्ड गार्ड’ (पुराने वरिष्ठ नेता) और ‘न्यू ब्रिगेड’ (अभिषेक बनर्जी समर्थित युवा नेता) के बीच का टकराव खुलकर सामने आ गया है।

​वरिष्ठ नेताओं का एक बड़ा वर्ग चुनावी विफलता के लिए सांगठनिक फैसलों और टिकट वितरण को जिम्मेदार ठहरा रहा है। सत्ता जाने के बाद भविष्य की असुरक्षा और पार्टी के भीतर हाशिए पर धकेले जाने के डर से यह 50 विधायकों का गुट एक अलग रास्ता तलाश रहा है।

​पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का यह मोड़ सबसे ऐतिहासिक और विस्फोटक साबित हो सकता है। 80 विधायकों की सीमित संख्या के कारण टीएमसी इस समय बेहद नाजुक मोड़ पर है। यदि 50 विधायकों की बगावत हकीकत में बदलती है, तो:

  • संख्या 54 से कम रहने पर: बागी विधायकों का राजनीतिक करियर संकट में पड़ेगा (सदस्यता जाएगी)।
  • संख्या 54 से ऊपर जाने पर: ममता बनर्जी के जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा शुरू होगी, जहां उन्हें अपनी ही बनाई पार्टी के नाम और निशान को बचाने के लिए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटने पड़ सकते हैं।

​अगले कुछ दिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास के लिए ‘करो या मरो’ वाले होने वाले हैं।

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