जेन-जी बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

जेन-जी बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

गणेश चौधरी/लेखक एक स्वतंत्र टिप्पणीकार है

​हाल ही में सोशल मीडिया में एक युवती का एक वीडियो काफी चर्चा में है, जिसमें युवती द्वारा सेना के जवानों को यह कहते सुना जा रहा है, “वी आर जेन जी, वी वोंट टॉलरेट दिस नॉनसेंस” अर्थात् हम जेन-ज़ी हैं, हम इस तरह की बकवास बर्दाश्त नहीं करेंगे। दरअसल ये शब्द लद्दाख घूमने गई युवती को सेना के जवानों द्वारा सुरक्षा कारणों से रोकने पर गुस्से में कहे गए शब्दों का प्रतिबिंब है।

​यह सही है कि प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 एवं अनुच्छेद 21 के तहत कहीं भी घूमने एवं आने-जाने की स्वतंत्रता है तथा यह भी सच है कि व्यक्ति को किसी क्षेत्र विशेष में जाने से रोके जाने का कारण जानना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन शब्दों की भी मर्यादा होनी चाहिए। शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन करना भी कहा तक उचित है। साथ ही युवती द्वारा सेना के जवानों को यह भी कहा गया कि आपकी सैलरी हमारे टैक्स के पैसों से आती है। इसलिए आपको हमारी बात माननी ही पड़ेगी।

​लेकिन देश की जेन-जी को यह भी ध्यान होना चाहिए कि सेना का जवान भी टैक्स प्रदाता है। इस देश की अर्थव्यवस्था के घूमते हुए पहिए में सेना के जवान का भी योगदान है। वह टैक्स देने के साथ-साथ सीमाओं पर देश की रक्षा भी करता है। वह टैक्स देने के साथ-साथ सियाचिन-ग्लेशियर जैसे दुर्गम स्थानों, जिन्हें चिकित्सा जगत मानवीय जीवन के अनुरूप ही नहीं मानते हैं, उन क्षेत्रों में हाड़-मांस को गलाते हुए तथा ऑक्सीजन की कमी से जूझते हुए विषम परिस्थितियों में सेवा भाव एवं कर्तव्यपरायणता के साथ माँ भारती की रक्षा में सदैव तत्पर रहते हैं। विभिन्न युद्धों एवं ऑपरेशंस में अपने कई साथियों के शहीद हो जाने के बाद भी मज़बूती के साथ लगातार डटे रहते हैं तथा अपनी वर्दी एवं शौर्य की पराकाष्ठा को पार करते हुए सेना के जवान सैलरी से ज्यादा एक भावनात्मक जुड़ाव के चलते मातृभूमि की रक्षार्थ जल, थल और नभ अर्थात् सभी परिस्थितियों में अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटते हैं।

​पिछले दिनों दिल्ली में हुए एक आंदोलन की सफलता के पश्चात जेन-जी के हौसले सातवे आसमान पर है और निश्चित रूप से होना भी चाहिए। क्योंकि हमारा देश युवाओं का देश है। इसी युवा शक्ति की बदौलत हम विकसित भारत-2047, आत्मनिर्भर भारत, एक भारत-श्रेष्ठ भारत, पाँच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था जैसे बड़े लक्ष्यों का सपना देख रहे हैं और लगातार इन लक्ष्यों के प्रति अग्रसर होते जा रहे हैं। इसलिए युवा पीढ़ी से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती। वैसे भी कहा गया है कि विद्या ददाति विनयम् अर्थात ज्ञान या शिक्षा विनम्रता लाती है। और यह सादगी, सरलता एवं सौम्यता युवा वर्ग के व्यवहार में दिखना चाहिए।

​भारतीय सेनाओं में कुछ शब्दों से भावनात्मक जुड़ाव होता है जैसे “नाम, नमक और निशान” जिन्हें चरितार्थ करने के लिए जवान हँसते-हँसते बलिदान हो जाते हैं तथा इसके अनुपम उदाहरण हम विभिन्न युद्धों एवं सेना ऑपरेशनस में देख चुके हैं।

​हालाँकि इस घटना के बाद देशभर में विरोध के स्वर उठने के बाद युवती ने सार्वजनिक रूप से माफी माँग ली है। लेकिन शब्दों के घाव को भरना इतना आसान नहीं है। इसलिए हमें यह याद रखना चाहिए कि युवाओं के किसी विशेष वर्ग से होना, हमें किसी के प्रति अमर्यादित एवं अशोभनीय व्यवहार करने की इजाजत नहीं देता।

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