धर्म/विशेष
“जीव की उत्पत्ति उसके कर्मों से होती है” — स्वामी रामानन्द गिरी
Edited By : नरेश गुनानी
टेलीग्राफ टाइम्स
जुलाई 07,2025
(हरिप्रसाद शर्मा)
पुष्कर/अजमेर।
धार्मिक नगरी पुष्कर स्थित गिरिशानन्द आश्रम में चल रहे सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के पंचम दिवस पर आश्रम में श्रद्धा और भक्ति का उल्लास देखने को मिला। इस अवसर पर कथा व्यास और आश्रम के अधिष्ठाता महन्त श्री श्री 1008 स्वामी रामानन्द गिरी जी महाराज ने कृष्ण भगवान की बाल लीलाओं का सुंदर और भावविभोर कर देने वाला वर्णन किया।
स्वामी रामानन्द गिरी ने प्रवचन में कहा कि “जीव की उत्पत्ति उसके कर्मों के अनुसार होती है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है।” उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है – सद्कर्म। यदि मनुष्य अपने कर्मों को शुद्ध और सात्विक रखे तो उसका जीवन सफल होता है।

पाश्चात्य संस्कृति की नकल पर जताई चिंता
स्वामी गिरी ने आज की युवा पीढ़ी द्वारा पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “लोग अब जन्मदिन पर केक काटते हैं, मोमबत्ती बुझाते हैं, जो भारतीय संस्कृति के विपरीत है। जन्मदिन पर हमें यज्ञ करना चाहिए, और जन्म नक्षत्र के दिन इसे मनाना चाहिए। इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-शांति का संचार होता है।”
शास्त्रों के अनुसार आचरण का किया आग्रह
प्रवचन के दौरान उन्होंने तीर्थ में शास्त्रसम्मत आचरण की आवश्यकता भी बताई। उन्होंने कहा कि “शास्त्रों के अनुसार तीर्थों में निवस्त्र होकर स्नान या शयन करना पाप के समान माना गया है। हमें अपनी संस्कृति, मर्यादा और शास्त्रों के अनुरूप आचरण करना चाहिए।”
‘मधुरम् मधुरम्’ गीत से बंधा भक्ति का सूत्र
कथा के दौरान “मधुरम् मधुरम्” गीत का सस्वर पाठ किया गया, जिसका अर्थ भी स्वामी जी ने श्रोताओं को सरल शब्दों में समझाया। गीत की मधुरता और उसके अर्थ ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया।
गोवर्धन पूजा का भी हुआ आयोजन
कथा के अंत में गोवर्धन पर्वत की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया। साथ ही श्रद्धालुओं ने पूजन कर प्रभु श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की।
श्रद्धालु भावविभोर
पुष्कर व आसपास के क्षेत्रों से आए सैकड़ों श्रद्धालु कथा स्थल पर उपस्थित रहे और आध्यात्मिक अमृत का रसपान किया। आश्रम में प्रतिदिन प्रसादी वितरण और भजन-कीर्तन का आयोजन भी किया जा रहा है।

