जयपुर में सामाजिक समरसता का महाकुंभ: 88 बस्तियों में एक साथ गूंजा राष्ट्रचेतना और पर्यावरण संरक्षण का स्वर

जयपुर में सामाजिक समरसता का महाकुंभ: 88 बस्तियों में एक साथ गूंजा राष्ट्रचेतना और पर्यावरण संरक्षण का स्वर

| योगेश शर्मा

जयपुर, 08 फरवरी 2026: गुलाबी नगरी जयपुर के आध्यात्मिक और सामाजिक इतिहास में रविवार का दिन एक मील का पत्थर साबित हुआ। महानगर में आयोजित ‘विराट हिंदू सम्मेलन’ श्रृंखला के तहत आज एक साथ 88 बस्तियों में सांस्कृतिक जागरण, सामाजिक समरसता और राष्ट्रभाव का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। हज़ारों की संख्या में नागरिकों, विशेषकर मातृशक्ति और युवाओं ने इस अभियान में जुड़कर एकता का उद्घोष किया।

​गौरतलब है कि महानगर की कुल 291 बस्तियों में इस कार्यक्रम का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से 142 बस्तियों (पूर्व में 54 और आज 88) में कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं।

फ़ोटो टेलीग्राफ टाइम्स

​कलश यात्राओं में उमड़ा मातृशक्ति का सैलाब

​सम्मेलनों का शुभारंभ भव्य कलश यात्राओं के साथ हुआ। जयपुर के विभिन्न अंचलों—महारानी फार्म, आमेर (पीली की तलाई), ब्रह्मपुरी, मानसरोवर, मालवीय नगर और निम्बार्क नगर सहित अन्य क्षेत्रों में पारंपरिक वेशभूषा में सजी हज़ारों महिलाओं ने कलश धारण कर शिरकत की।

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  • संगठित शक्ति: कई स्थानों पर 1500 से अधिक महिलाओं की भागीदारी ने समाज की संगठित मातृशक्ति का परिचय दिया।
  • भक्तिमय वातावरण: मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और शंखनाद से पूरी राजधानी का वातावरण आध्यात्मिक और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत हो गया।

​पर्यावरण और ‘पंचतत्व’ का संदेश: प्लास्टिक मुक्त समाज का संकल्प

​इस सम्मेलन में केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ज्वलंत पर्यावरणीय मुद्दों पर भी गहन मंथन हुआ:

  • तुलसी यात्रा: ब्रह्मपुरी क्षेत्र में आयोजित ‘तुलसी यात्रा’ विशेष आकर्षण रही, जिसमें 1500 महिलाओं ने भाग लिया। वक्ताओं ने तुलसी को भारतीय स्वास्थ्य और पर्यावरण चेतना का प्रतीक बताया।
  • प्रकृति संरक्षण: वक्ताओं ने जल, वायु, आकाश, पृथ्वी और अग्नि (पंचतत्व) के संरक्षण को मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य बताया।
  • सामूहिक शपथ: प्लास्टिक के दुष्प्रभावों पर चिंता जताते हुए अनेक स्थलों पर नागरिकों ने प्लास्टिक त्यागने और जूट/कपड़े के थैले अपनाने का संकल्प लिया।

​सामाजिक मूल्यों और संस्कारों का सम्मान

​सम्मेलन के दौरान समाज में उत्कृष्ट उदाहरण पेश करने वाले व्यक्तियों और परिवारों को सम्मानित किया गया। सम्मान की श्रेणियों ने भारतीय जीवन मूल्यों की झलक दिखाई:

  • पारिवारिक संस्कार: संयुक्त परिवार प्रणाली अपनाने वाले और बिना दहेज विवाह करने वाले परिवारों का सम्मान।
  • राष्ट्र सेवा: वीरगति प्राप्त सैनिकों के परिजनों और सक्रिय समाजसेवियों का अभिनंदन।
  • भावी पीढ़ी: प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं और पर्यावरण/गौसेवा में जुटे युवाओं को प्रोत्साहन।

​’पंच परिवर्तन’ से राष्ट्र निर्माण का आह्वान

​मुख्य वक्ताओं ने सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक शिष्टाचार (पंच परिवर्तन) को जीवन में उतारने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा भेदभाव नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और करुणा सिखाती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज संगठित रहा, हमारी संस्कृति सुरक्षित रही।

​”भारत की मूल आत्मा सनातन धर्म है, जो समग्र सृष्टि के कल्याण की भावना सिखाता है। सामाजिक समरसता तभी सुदृढ़ होगी जब हम कर्तव्यों के प्रति जागरूक होंगे।” — मुख्य वक्ता

 

सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: कार्यक्रमों में बच्चों और कलाकारों ने कृष्ण लीला, देशभक्ति नाटकों और भक्ति नृत्यों के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। शेष बस्तियों में भी आगामी चरणों में इन सम्मेलनों का आयोजन निरंतर जारी रहेगा।

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