| योगेश शर्मा
जयपुर। गुलाबी नगरी, जिसे ‘छोटीकाशी’ के नाम से भी जाना जाता है, शनिवार को पूरी तरह गणपति की भक्ति में सराबोर नजर आई। शनि पुष्य नक्षत्र के अत्यंत शुभ संयोग पर शहर के प्रमुख गणेश मंदिरों में प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश का वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भव्य पंचामृत अभिषेक किया गया। इस अवसर पर भगवान को सिंदूरी चोला चढ़ाकर नवीन पोशाक धारण कराई गई और ऋतु पुष्पों से अलौकिक श्रृंगार किया गया।
गढ़ गणेश: बाल रूप गणपति से विश्व शांति की प्रार्थना
जयपुर की स्थापना से भी प्राचीन गढ़ गणेश मंदिर में महंत प्रदीप औदीच्य के सान्निध्य में विशेष आयोजन हुए। यहाँ भगवान के ‘पुरुषाकृति बाल रूप’ का वेदोक्त विधि से अभिषेक किया गया।
- विशेष प्रार्थना: दर्शनों के लिए उमड़े हजारों श्रद्धालुओं ने अपनी मनोकामनाओं के साथ-साथ इराक-इजरायल युद्ध विराम और विश्व शांति के लिए विशेष प्रार्थना की।
मोती डूंगरी: 251 किलो दूध और औषधीय च्यवनप्राश का वितरण
प्रसिद्ध मोती डूंगरी गणेश मंदिर में महंत पं. कैलाश शर्मा के सान्निध्य में भक्ति का सैलाब उमड़ा। अभिषेक की प्रक्रिया अत्यंत भव्य रही:
- अभिषेक सामग्री: भगवान का 251 किलो दूध, 21 किलो दही, घी, 21 किलो बूरा, शहद, केवड़ा जल और गुलाब जल के साथ इत्र से अभिषेक किया गया।
- महाभोग: गणपति को सहस्त्रनाम पाठ के साथ 1001 मोदकों का भोग लगाया गया।
- प्रसाद वितरण: भक्तों को रक्षा सूत्र और स्वास्थ्य के लिए ‘हल्दी’ का प्रसाद बांटा गया। शाम को भगवान को फूल बंगले में विराजमान कर खीर और च्यवनप्राश का भोग लगाया गया, जिसे बाद में भक्तों में वितरित किया गया।
प्रमुख मंदिरों में पुष्याभिषेक की धूम
शहर के अन्य मंदिरों में भी सुबह से ही उत्सव का माहौल रहा:
- नहर के गणेशजी (ब्रह्मपुरी): महंत जय शर्मा के सान्निध्य में दुर्वा से मार्जन कर पुष्याभिषेक और महाआरती की गई।
- गीता गायत्री गणेश (गलता गेट): पं. राजकुमार चतुर्वेदी ने अभिषेक किया और नीतिश चतुर्वेदी ने भगवान को सिंदूरी चोला चढ़ाया।
- अन्य मंदिर: सूरजपोल के श्वेत सिद्धी विनायक, बड़ी चौपड़ के ध्वजाधीश गणेश, चांदपोल के परकोटा गणेश, दिल्ली बाईपास के आत्माराम ब्रह्मचारी गणेश, चौड़ा रास्ता के काले गणेश, झोटवाड़ा के खिरणी फाटक गणेश और आगरा रोड के गंगोत्री गणेश मंदिर में भी शनि पुष्याभिषेक के विशेष आयोजन हुए।
भक्तों को मिला विशेष आशीर्वाद
पुष्याभिषेक के दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालुओं को मंदिरों में सिंदूर, दुर्वा, रक्षा सूत्र और हल्दी वितरित की गई। मान्यता है कि पुष्य नक्षत्र में भगवान का यह प्रसाद ग्रहण करने से आरोग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। शाम होते-होते सभी मंदिर रंग-बिरंगी रोशनियों और फूलों की खुशबू से महक उठे।
