खेदापाली और बांधापाली गांव की संपूर्ण भूमि के समग्र अधिग्रहण की मांग
13 वर्षों से लंबित पुनर्वास, रोजगार और बालिग सदस्यों के अधिकारों पर उठाए सवाल
सीएसआर (CSR) फंड के उपयोग पर गंभीर आपत्ति, खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक करने की मांग
पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य और डीएवी स्कूल में बच्चों के प्रवेश जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे ग्रामीण
छाल/रायगढ़/ बुधराम अग्रवाल/साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की छाल ओपन कास्ट माइंस (OCM) के प्रस्तावित विस्तार को लेकर प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आ गया है। प्रभावित ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन के समक्ष अपनी लंबित समस्याओं और मांगों को लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराते हुए स्पष्ट कर दिया है कि पहले प्रभावितों के अधिकारों का स्थायी समाधान हो, उसके बाद ही विस्तार की कोई प्रक्रिया आगे बढ़े। ग्रामीणों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए आगामी 29 सितंबर 2026 को प्रस्तावित जनसुनवाई के पूर्ण विरोध और बहिष्कार की घोषणा कर दी है।
खेदापाली और बांधापाली की संपूर्ण भूमि अधिग्रहण की मांग
ग्रामीणों ने खेदापाली एवं बांधापाली गांवों की आंशिक भूमि के बजाय संपूर्ण भूमि के एकमुश्त अधिग्रहण की मांग को प्रमुखता से उठाया है। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों गांवों की कुछ ही जमीन अधिग्रहित की गई है, जिससे गांव दो हिस्सों में बंट गया है। खनन गतिविधियों, धूल और भारी प्रदूषण का असर पूरे गांव पर पड़ रहा है। ऐसे में आंशिक अधिग्रहण न्यायसंगत नहीं है। ग्रामीणों की मांग है कि दोनों गांवों का समग्र रूप से अधिग्रहण किया जाए और भूमि, मुआवजा, पुनर्वास व रोजगार से जुड़े सभी प्रकरणों का एक साथ निस्तारण हो।
13 वर्षों से लंबित है पुनर्वास, टूटे मकानों के बाद भी ठिकाना नहीं
ज्ञापन में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि भूमि अधिग्रहण के करीब 13 वर्ष बीत जाने के बाद भी कई प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का मामला अधर में लटका है। ग्रामीणों के मकान तोड़े जा चुके हैं, लेकिन आज तक उन्हें पुनर्वास स्थल का चयन कर भूखंड आबंटित नहीं किए गए। इसके अलावा, अधिग्रहण के समय से अब तक बालिग हो चुके परिवार के सदस्यों को पुनर्वास का लाभ देने, अल्प भूमि अधिग्रहण वाले किसानों को रोजगार से जोड़ने तथा विस्थापित भूमिहीन परिवारों को सुनिश्चित आजीविका देने की मांग भी रखी गई है।
सीएसआर (CSR) फंड के उपयोग पर तीखे सवाल
ग्रामीणों ने एसईसीएल की सीएसआर व्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि छाल क्षेत्र से अकूत कोयला और प्राकृतिक संपदा निकालने के बावजूद स्थानीय प्रभावित गांवों को सीएसआर का वाजिब लाभ नहीं मिल रहा है।
ग्रामीणों ने कहा कि सीएसआर केवल कागजी और औपचारिक खानापूर्ति बनकर रह गया है। बुनियादी सवाल यह है कि यदि खदान से सीधे तौर पर प्रभावित गांवों में ही शुद्ध पेयजल, पक्की सड़कें, प्राथमिक स्वास्थ्य और स्कूल परिवहन जैसी सुविधाएं नहीं हैं, तो फिर सीएसआर फंड का लाभ कहां और किस आधार पर दिया जा रहा है? ग्रामीणों ने मांग की है कि प्रभावित गांवों के लिए स्वीकृत, आबंटित और खर्च की गई सीएसआर राशि का मदवार विवरण सार्वजनिक किया जाए और प्राथमिकताओं का निर्धारण ग्रामीणों की जरूरतों के अनुसार हो।
बुनियादी सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली
प्रभावित क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। एसईसीएल प्रशासन की ओर से न तो क्षेत्र में पर्याप्त स्वास्थ्य लाभ दिए जा रहे हैं और न ही आपातकालीन स्थिति के लिए एंबुलेंस की समुचित व्यवस्था है। इसके साथ ही, एसईसीएल द्वारा संचालित डीएवी विद्यालय में प्रभावित किसानों के बच्चों के प्रवेश में आ रही दिक्कतों को लेकर भी भारी रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि खनन से जिनका जीवन प्रभावित हुआ है, उनके बच्चों की शिक्षा में किसी भी तरह की बाधा असहनीय है।
रोजगार प्रक्रिया में जानबूझकर विलंब का आरोप
ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया कि प्रभावितों को रोजगार देने की दस्तावेजी प्रक्रिया को जानबूझकर जटिल और लंबा खींचा जा रहा है। फाइलों के महीनों तक अटके रहने से पात्र युवाओं को रोजगार के लिए भटकना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने इस पूरी प्रक्रिया की समयसीमा तय कर त्वरित निस्तारण की मांग की है।
समाधान शिविर के बाद अब जनसुनवाई का बहिष्कार
लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने बीते 19 सितंबर को आयोजित समाधान शिविर का भी बहिष्कार किया था। अब ग्रामीणों ने एक स्वर में 29 सितंबर की जनसुनवाई का बहिष्कार करने का ऐलान करते हुए कहा है कि जब तक शासन-प्रशासन भूमि, पुनर्वास, रोजगार, सीएसआर और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शी और स्थायी निर्णय नहीं लेता, तब तक खदान विस्तार की कोई भी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने दी जाएगी।
क्या कहते हैं जिम्मेदार और ग्रामीण प्रतिनिधि:
”प्रभावित परिवारों की भूमि, पुनर्वास और रोजगार की लंबित समस्याओं का समाधान किए बिना खदान विस्तार उचित नहीं है। इन्हीं कारणों से हम 29 सितंबर की जनसुनवाई का विरोध करते हैं।”
— रामसिंग राठिया, ग्राम पंचायत खेदापाली
”जब प्रभावित गांवों में सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं की समस्याएं बनी हुई हैं, तो पहले उनका समाधान होना चाहिए। इसलिए हम प्रस्तावित जनसुनवाई का विरोध करते हैं।”
— लालू ठाकुर, प्रतिनिधि, ग्राम पंचायत छाल
”हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन प्रभावित लोगों के अधिकारों की अनदेखी कतई स्वीकार नहीं करेंगे। लंबित मामलों का समाधान होने तक हम 29 सितंबर की जनसुनवाई का विरोध और बहिष्कार करते हैं।”
— शिवनाथ अकेला, ग्राम पंचायत खेदापाली