छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: व्यभिचार में लिप्त पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण, फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: व्यभिचार में लिप्त पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण, फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त

Edited By: गणपत चौहान
टेलीग्राफ टाइम्स
मई 20, 2025

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला को व्यभिचार (अवैध संबंध) के आधार पर तलाक दिया गया है, तो वह अपने अलग हो चुके पति से भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) की हकदार नहीं हो सकती। हाईकोर्ट ने इस आधार पर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पत्नी को 4 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। साथ ही पत्नी द्वारा भत्ते की राशि बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग वाली याचिका भी खारिज कर दी गई है।

क्या है पूरा मामला

रायपुर निवासी एक युवक ने 2019 में एक युवती से हिंदू रीति-रिवाज से विवाह किया था। लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के संबंधों में खटास आ गई। पत्नी ने पति पर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप लगाए और मार्च 2021 में ससुराल छोड़ अपने मायके चली गई, जहां वह अपने भाई के घर रहने लगी।

इसके बाद पत्नी ने पति पर क्रूरता और चरित्र पर संदेह करने के आरोप लगाते हुए फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण की अर्जी लगाई। वहीं, पति ने भी फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल कर दी और आरोप लगाया कि उसकी पत्नी का उसके छोटे भाई यानी देवर के साथ अवैध संबंध है। उसने यह भी कहा कि जब उसने इस पर आपत्ति जताई, तो पत्नी ने उसे झूठे केस में फंसाने की धमकी दी।

फैमिली कोर्ट का फैसला

फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पति के पक्ष में व्यभिचार के आधार पर तलाक की डिक्री पारित की, लेकिन साथ ही पत्नी को मासिक 4 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश भी जारी कर दिया। इस आदेश के खिलाफ दोनों पक्षों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख किया। पत्नी ने 20 हजार रुपये प्रति माह भत्ते की मांग की, वहीं पति ने पत्नी के व्यभिचार में लिप्त होने का हवाला देते हुए भरण-पोषण आदेश को रद्द करने की मांग की।

हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

हाईकोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा दी गई तलाक की डिक्री यह स्पष्ट प्रमाण है कि पत्नी व्यभिचार में लिप्त थी। ऐसे में वह पति से भरण-पोषण की कानूनी अधिकार खो चुकी है।

कोर्ट का कहना था:

“जब एक बार व्यभिचार के आधार पर तलाक की डिक्री पारित हो चुकी है, तो दिवानी न्यायालय के निर्णय के विपरीत कोई अलग दृष्टिकोण अपनाना संभव नहीं है।”

फैसले का प्रभाव

यह फैसला उन मामलों में मिसाल बन सकता है जहां पत्नी पर विवाहेतर संबंधों के आरोप सिद्ध हो जाते हैं और वह पति से आर्थिक सहायता की मांग करती है। यह निर्णय न्याय व्यवस्था में नैतिक मूल्यों और वैवाहिक निष्ठा को केंद्र में रखते हुए दिया गया है।


 

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