गायत्री नगर जैन समाज का बढ़ा मान: शुभा जैन ‘रत्नाकर पुरस्कार’ से सम्मानित, धार्मिक संस्कार शिक्षण शिविर परीक्षा में हासिल किया प्रथम स्थान

योगेश शर्मा 

जयपुर। धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों के केंद्र सांगानेर स्थित श्री दिगंबर जैन श्रमण संस्कृत संस्थान द्वारा महारानी फार्म, गायत्री नगर में आयोजित ‘धार्मिक संस्कार शिक्षण शिविर’ में प्रतिभा की एक अनूठी मिशाल देखने को मिली। शिविर के अंतर्गत आयोजित ‘द्रव्य संग्रह’ की विशेष कक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए श्रीमती शुभा जैन ने प्रथम स्थान प्राप्त किया है। इस शानदार उपलब्धि के बाद सांगानेर मुख्य संस्थान में आयोजित मुख्य परीक्षा को भी उन्होंने ससम्मान उत्तीर्ण किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें प्रतिष्ठित ‘रत्नाकर पुरस्कार’ से नवाजा गया है।

समाज और परिवार में हर्ष की लहर

​विश्वकर्मा नगर, महारानी फार्म निवासी सुप्रसिद्ध अधिवक्ता संदीप जैन की धर्मपत्नी तथा रघु विहार निवासी अशोक व अनीता रावका की सुपुत्री श्रीमती शुभा जैन ने अपनी इस धार्मिक और शैक्षणिक योग्यता के बल पर पूरे गायत्री नगर जैन समाज का गौरव देश-प्रदेश में बढ़ाया है। गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाते हुए जैन दर्शन के गूढ़ ग्रंथ ‘द्रव्य संग्रह’ का इतनी गहनता से अध्ययन करना और परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त करना उनकी धर्म के प्रति अटूट आस्था और समर्पण को दर्शाता है।

बधाइयों और शुभकामनाओं का तांता

​शुभा जैन को ‘रत्नाकर पुरस्कार’ मिलने की घोषणा के बाद से ही गायत्री नगर जैन समाज सहित जयपुर की विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और स्वयंसेवी संस्थाओं में हर्ष का माहौल है। समाज के प्रबुद्ध जनों, महिला मंडलों और युवा संगठनों ने उन्हें तथा उनके पूरे परिवार को व्यक्तिगत रूप से और सोशल मीडिया के माध्यम से हार्दिक बधाइयां एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगल कामनाएं प्रेषित की हैं।

क्या है ‘रत्नाकर पुरस्कार’?

​श्री दिगंबर जैन श्रमण संस्कृत संस्थान सांगानेर द्वारा आयोजित होने वाले इन शिविरों का मुख्य उद्देश्य श्रावकों में जैन धर्म के मूल सिद्धांतों, तत्वों और संस्कारों का बीजारोपण करना है। शिविर के दौरान कठिन विषयों (जैसे द्रव्य संग्रह) पर कक्षाएं ली जाती हैं और उसके बाद सांगानेर संस्थान द्वारा बेहद निष्पक्ष और कड़े मापदंडों के आधार पर परीक्षा आयोजित की जाती है। इस परीक्षा में सर्वोच्च अंक या विशिष्ट योग्यता प्राप्त करने वाले साधकों को ही ‘रत्नाकर पुरस्कार’ से अलंकृत किया जाता है, जो समाज में बेहद सम्मानजनक माना जाता है।

​श्रीमती शुभा जैन की इस धार्मिक उपलब्धि ने नई पीढ़ी और समाज की अन्य महिलाओं के लिए भी स्वाध्याय (Self-study) और धर्म मार्ग पर आगे बढ़ने की एक नई प्रेरणा दी है।

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