गाज़ियाबाद (सुनील शर्मा): शहरी स्वच्छता की परिभाषा अब केवल कूड़ा उठाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उस कचरे को एक मूल्यवान संसाधन में बदलना ही वास्तविक सफलता है। आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U 2.0) के ‘कचरा मुक्त शहर’ (Garbage Free Cities) के संकल्प को साकार करते हुए गाज़ियाबाद नगर निगम ने एक अनोखी मिसाल पेश की है। शहर की सड़कों, डेयरियों और गौशालाओं से निकलने वाले जिस गोबर को पहले नालियों के जाम होने और गंदगी का मुख्य कारण माना जाता था, अब उसे वैज्ञानिक पद्धति से प्रबंधित करके ‘प्राकृतिक पेंट’ (Natural Paint) में बदला जा रहा है।
यह नवोन्मेषी प्रयास न केवल कचरा प्रबंधन का एक टिकाऊ मॉडल बन चुका है, बल्कि इसे वैश्विक मंच पर भी सराहना मिल रही है।
अपशिष्ट से संपदा: कैसे बनता है गोबर से प्राकृतिक पेंट?
नगर निगम के सामने सबसे बड़ी चुनौती पशुओं के गोबर का सही निपटान करना था। लैंडफिल साइट्स पर लंबे समय तक पड़ा रहने वाला गोबर अन्य कचरे के साथ मिलकर मीथेन जैसी हानिकारक गैसें छोड़ता है, जो पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए निगम ने ‘अपशिष्ट से संपदा’ (Waste to Wealth) का मंत्र अपनाते हुए एक सर्कुलर अर्थव्यवस्था (Circular Economy) का मॉडल तैयार किया है।
इस तकनीक की पूरी प्रक्रिया बेहद वैज्ञानिक और व्यवस्थित है:
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- कच्चे माल का एकत्रीकरण: शहर की विभिन्न डेयरियों और गौशालाओं से प्रतिदिन टनों के हिसाब से गाय का गोबर इकट्ठा किया जाता है।
- रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग: गोबर को आधुनिक रिफाइनिंग मशीनों के जरिए शोधित (Filter) करके उसका तरल हिस्सा (अर्क) अलग किया जाता है।
- बैक्टीरिया और गंध से मुक्ति: इस अर्क को उच्च तापमान पर प्रोसेस किया जाता है, जिससे इसमें मौजूद सभी हानिकारक बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं और गोबर की गंध पूरी तरह गायब हो जाती है।
- प्राकृतिक खनिजों का मिश्रण: इस गंधहीन और जीवाणुरहित अर्क में चूना, जस्ता (Zinc) और प्राकृतिक गोंद जैसे सुरक्षित खनिज मिलाए जाते हैं। इसके बाद उच्च गुणवत्ता वाला ‘शीतलता प्रदान करने वाला रूफटॉप पेंट’ (Cooling Rooftop Paint) तैयार होता है।
उत्पादन का गणित: इस वैज्ञानिक प्रक्रिया में 100 किलो गोबर से लगभग 30 से 40 लीटर तक प्राकृतिक पेंट तैयार हो जाता है, जो सीधे तौर पर लैंडफिल साइट्स पर जाने वाले कचरे के बोझ को कम कर रहा है।
आर्थिक सशक्तीकरण और महिलाओं को सम्मानजनक रोजगार
यह परियोजना केवल पर्यावरण सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय का एक ठोस जरिया भी तैयार किया है। इस पूरी पहल का संचालन महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) द्वारा किया जा रहा है। इससे महिलाओं को अपने ही क्षेत्र में सम्मानजनक आजीविका मिल रही है और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
चूंकि इस पेंट को बनाने के लिए मुख्य कच्चा माल यानी गोबर स्थानीय स्तर पर बहुत कम लागत में उपलब्ध हो जाता है, इसलिए बाजार में मिलने वाले रासायनिक (Chemical) पेंट्स की तुलना में इसकी कीमत बेहद किफायती है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य को तिहरा लाभ
गाज़ियाबाद का यह मॉडल एक साथ तीन बड़े संकटों — गंदगी, शहरी गर्मी (Heat Stress) और रोजगार की कमी — का प्रभावी समाधान करता है। इस प्राकृतिक पेंट के इस्तेमाल से उपभोक्ताओं को कई सीधे लाभ मिल रहे हैं:
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विशेषता |
रासायनिक पेंट (Chemical Paint) |
गाज़ियाबाद का प्राकृतिक पेंट |
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तापमान नियंत्रण |
गर्मी को सोखता है, जिससे घर अंदर से गर्म होते हैं। |
घरों के अंदर का तापमान 3°C से 5°C तक कम रखता है। |
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आर्थिक बचत |
महंगा होता है और घर गर्म होने से बिजली का बिल बढ़ता है। |
किफायती दाम और बिजली (AC/कूलर) की भारी बचत। |
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स्वास्थ्य पर असर |
इसमें हानिकारक VOCs (Volatile Organic Compounds) होते हैं जो जहरीले होते हैं। |
पूरी तरह टॉक्सिन-फ्री और पर्यावरण-अनुकूल है। |
स्वच्छ भारत मिशन (U) 2.0 के तहत गाज़ियाबाद नगर निगम की इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही तकनीक और इच्छाशक्ति हो, तो पारंपरिक कचरे को भी समृद्धि और आत्मनिर्भरता के वैश्विक ब्रांड में बदला जा सकता है।