ख्वाजा साहब की साहिबजादी बीबी हाफिजा का उर्स संपन्न; कुल की रस्म के साथ उमड़ा अकीदतमंदों का सैलाब
अजमेर/सुल्तानपुर | 9 जनवरी, 2026 (हरिप्रसाद शर्मा)
विश्व प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की साहिबजादी बीबी हाफिजा जमाल का सालाना उर्स शुक्रवार को पूरी अकीदत, रूहानियत और पारंपरिक रिवायतों के साथ संपन्न हुआ। दरगाह क्षेत्र में आयोजित इस विशेष अवसर पर देश-विदेश से आए हजारों जायरीन और अकीदतमंदों ने हाजिरी दी और मन्नतें मांगीं।
महफिल-ए-समां में गूंजे सूफियाना कलाम
उर्स की शुरुआत गद्दीनशीन सैयद फखर काजमी चिश्ती की सदारत में महफिल-ए-समां से हुई। महफिल में कव्वालों ने फारसी, उर्दू और ब्रज भाषा में सूफियाना कलाम पेश कर समां बांध दिया। जब कव्वालों ने “आज रंग है री माँ, बीबी हाफिजा जमाल घर रंग है री” की प्रस्तुति दी, तो पूरा माहौल रूहानियत से भर उठा और अकीदतमंद झूमने लगे।
कुल की रस्म और तोप की गूंज
उर्स के अंतिम दिन कुल की रस्म अत्यंत भव्यता के साथ अदा की गई। दरगाह में दस्तरख्वान पढ़ा गया और फातेहा ख्वानी हुई। परंपरा के अनुसार, बड़े पीर की पहाड़ी से गदरशाह द्वारा तोप चलाई गई, जो उर्स की रस्मों के समापन का संकेत थी। मौरूसी अमले ने शादियाने बजाकर इस मुबारक मौके की घोषणा की।
बीबी हाफिजा: इल्म और बरकत की प्रतीक
अधिवक्ता डॉ. सैयद रागिब चिश्ती ने बीबी हाफिजा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे ख्वाजा साहब की अत्यंत प्रिय बेटी थीं। उन्होंने बचपन में ही कुरान कंठस्थ कर लिया था, जिस कारण उन्हें ‘बीबी हाफिजा’ कहा जाने लगा।
- धार्मिक सेवाएं: उन्होंने महिलाओं को दीन की तालीम देने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
- मान्यता: अकीदत है कि उनकी दुआओं से नि:संतान दंपत्तियों को संतान की प्राप्ति होती है।
- ऐतिहासिक स्थल: करीब 850 वर्ष पूर्व उन्होंने ‘हैप्पी वैली’ में चिल्ला किया था, जो आज भी जायरीन की आस्था का केंद्र है।
परंपराएं और ‘उर्साना’ का तोहफा
उर्स के दौरान उनके नाम की विशेष नियाज (हलवा-लुच्ची) बांटी गई। चिश्तिया खानदान के लोग आज भी उस रिवायत को निभा रहे हैं, जिसके तहत ख्वाजा साहब स्वयं अपने पीर के उर्स के बाद अपनी बेटी को ‘उर्साने’ के रूप में तोहफा पेश किया करते थे। इस परंपरा को आज भी उनके वंशज और अनुयायी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।

