खरसिया सिविल अस्पताल का ‘तुगलकी फरमान’: क्या सरकारी सिस्टम की जिद गरीब की जान से कीमती है?

गनपत चौहान 

कुड़ेकेला/रायगढ़।

रायगढ़ जिले का खरसिया सिविल अस्पताल, जिसे वनांचल क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों के लिए ‘संजीवनी’ माना जाता है, इन दिनों अपने संवेदनहीन नियमों और अधिकारियों की कथित मनमानी को लेकर विवादों के घेरे में है। स्वास्थ्य विभाग की अव्यवस्था का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने मानवता और सरकारी सिस्टम, दोनों पर कड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ एक प्रसूता की जान बचाने के लिए आए रक्त को सिर्फ इसलिए नकार दिया गया क्योंकि वह ‘प्राइवेट ब्लड बैंक’ से लाया गया था।

जिंदगी और मौत के बीच फंसी प्रसूता, नियमों की बेड़ियाँ

​मामला एक ग्रामीण प्रसूता महिला से जुड़ा है, जिसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने तत्काल ऑपरेशन (सिजेरियन) की सलाह दी। ऑपरेशन के लिए ‘O नेगेटिव’ ब्लड की आवश्यकता थी। यह एक अत्यंत दुर्लभ (Rare) ब्लड ग्रुप है जो आसानी से उपलब्ध नहीं होता। जब अस्पताल के सरकारी ब्लड बैंक में यह ग्रुप नहीं मिला, तो डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और परिजनों को मरीज को दूसरे अस्पताल रेफर करने की सलाह दे डाली।

निजी ब्लड बैंक का खून बना ‘अछूत’

​परिजनों ने हार नहीं मानी और काफी मशक्कत के बाद शहर के ‘समर्पण’ प्राइवेट ब्लड बैंक से ओ-नेगेटिव रक्त की व्यवस्था कर ली। लेकिन असली संकट तब खड़ा हुआ जब अस्पताल प्रशासन ने इस रक्त को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने उच्चाधिकारियों के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि “प्राइवेट संस्था का खून अस्पताल में नहीं चढ़ाया जाएगा।”

सिस्टम की सड़न पर कड़वे सवाल

​इस घटना ने अस्पताल की कार्यप्रणाली और बीएमओ (BMO) के फैसलों पर कई गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं:

  • ​क्या शासन द्वारा लाइसेंस प्राप्त प्राइवेट ब्लड बैंक अवैध हैं?
  • ​यदि स्वास्थ्य विभाग ने उन्हें संचालन की अनुमति दी है, तो उनका रक्त ‘अछूत’ कैसे हो गया?
  • ​क्या खून का भी रंग ‘सरकारी’ और ‘प्राइवेट’ होता है?
  • ​एक मरते हुए मरीज को समय पर रक्त न चढ़ाना क्या ‘आपराधिक लापरवाही’ की श्रेणी में नहीं आता?

वनांचल के गरीबों के लिए ‘वरदान’ या ‘अभिशाप’?

​खरसिया का यह अस्पताल दूर-दराज के उन ग्रामीणों का एकमात्र सहारा है जिनके पास निजी अस्पतालों में जाने के साधन नहीं हैं। बीएमओ के इस कथित आदेश ने न केवल परिजनों को मानसिक प्रताड़ना दी, बल्कि जच्चा और बच्चा दोनों की जान जोखिम में डाल दी। सवाल यह उठता है कि क्या नियम इंसानियत से बड़े हो गए हैं?

प्रशासनिक प्रतिक्रिया: एसडीएम ने जताया खेद

​इस संवेदनशील मामले पर जब अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), खरसिया से संपर्क किया गया, तो उन्होंने मामले की जानकारी होने से इनकार किया। हालांकि, वास्तविकता जानने के बाद उन्होंने गहरा खेद जताते हुए कहा, “यदि ऐसी कोई घटना हुई है, तो यह अत्यंत निंदनीय है। मैं इस संबंध में पत्र जारी कर निर्देशित करूँगा कि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न हो।”

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