खरसिया अपडेट: पुलिसिया पूछताछ के बाद ग्रामीण की मौत का मामला;

घंटों चले चक्काजाम के बाद शर्तों पर बनी सहमति, हड़ताल समाप्त

| रिपोर्ट गणपत चौहान छत्तीसगढ़

रायगढ़/खरसिया। खरसिया के परासकोल मर्डर केस में पुलिस पूछताछ के बाद ग्रामीण रमेश लाल चौहान की मौत से उपजा जनाक्रोश फिलहाल शांत हो गया है। घंटों चले तनावपूर्ण प्रदर्शन, चक्काजाम और प्रशासन के साथ हुई मैराथन बैठक के बाद ग्रामीणों ने कुछ महत्वपूर्ण शर्तों पर अपनी हड़ताल समाप्त कर दी है। विशेष बात यह है कि फिलहाल बिना एफआईआर (FIR) दर्ज किए ही मामला शांत हुआ है, लेकिन प्रशासन ने पीड़ित परिवार की मांगों पर ठोस आश्वासन दिए हैं।

​प्रशासन और ग्रामीणों के बीच बंद कमरे में हुई वार्ता

​रमेश चौहान की रायपुर में मौत और ‘डेथ सर्टिफिकेट’ में सामने आए ‘इंट्रापैरेन्काइमल हेमरेज’ के खुलासे के बाद खरसिया तहसील कार्यालय के बाहर माहौल बेहद तनावपूर्ण था। सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण और चौहान समाज के लोग दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई और मुआवजे की मांग को लेकर अड़े थे। स्थिति को बेकाबू होता देख एसडीएम (SDM) और एसडीओपी (SDOP) ने आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों के साथ बंद कमरे में लंबी चर्चा की।

​इन शर्तों पर बनी सहमति

​प्रशासनिक अधिकारियों और विधायक उमेश पटेल की मौजूदगी में हुई चर्चा के बाद आंदोलनकारियों ने निम्नलिखित शर्तों के आधार पर प्रदर्शन समाप्त करने का निर्णय लिया:

  • आर्थिक सहायता (मुआवजा): पीड़ित परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता राशि प्रदान करने और भविष्य में उचित मुआवजे की फाइल आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।
  • अनुकंपा नियुक्ति/सरकारी नौकरी: मृतक के परिवार के एक सदस्य को योग्यतानुसार सरकारी नौकरी या वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराने की मांग को शासन स्तर पर भेजने का आश्वासन दिया गया।
  • निष्पक्ष जांच का भरोसा: हालांकि तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं की गई है, लेकिन प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि पोस्टमार्टम की विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद यदि पुलिसिया प्रताड़ना की पुष्टि होती है, तो वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
  • बच्चों की शिक्षा: मृतक के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी और परिवार की सुरक्षा को लेकर भी चर्चा हुई।

​फिलहाल शांत हुआ प्रदर्शन, पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार

​समझौते के बाद चक्काजाम खोल दिया गया है और तहसील कार्यालय के बाहर से भीड़ छंट गई है। ग्रामीणों का कहना है कि वे प्रशासन के आश्वासनों पर भरोसा कर रहे हैं, लेकिन उनकी नजरें अभी भी पोस्टमार्टम (PM) रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि पीएम रिपोर्ट में बाहरी चोट या अमानवीय व्यवहार की पुष्टि होती है, तो ग्रामीण पुनः लामबंद हो सकते हैं।

​क्या कहता है कानून?

​विशेषज्ञों के अनुसार, कस्टोडियल डेथ के मामलों में एफआईआर से पहले अक्सर मजिस्ट्रेट जांच (Magisterial Inquiry) और पीएम रिपोर्ट को आधार बनाया जाता है। फिलहाल बिना किसी कानूनी केस दर्ज हुए मामला शांत होना प्रशासन के लिए बड़ी राहत की बात है।

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