सुनील शर्मा
नई दिल्ली/नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पंजीकरण (Registration) को लेकर कांग्रेस द्वारा उठाए गए सवालों और आरोपों पर संघ की ओर से करारा पलटवार किया गया है। संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों और विचारकों ने कांग्रेस के तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि आरएसएस कोई राजनीतिक दल या एनजीओ नहीं, बल्कि समाज का ही एक अंग है और “समाज का कभी कोई रजिस्ट्रेशन नहीं होता।”
कांग्रेस लगातार यह आरोप लगाती रही है कि आरएसएस एक अपंजीकृत संस्था है, जो देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करती है, लेकिन कानूनी रूप से जवाबदेह नहीं है। इस पर संघ की ओर से बेहद स्पष्ट और वैचारिक जवाब सामने आया है।
’सोसाइटी नहीं, समाज का संगठन है संघ’
संघ के रणनीतिकारों ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए संगठन की मूल भावना को रेखांकित किया। संघ का मानना है कि किसी ट्रस्ट, समिति या सोसाइटी को चलाने के लिए पंजीकरण की आवश्यकता होती है, लेकिन जो संगठन संपूर्ण समाज को एकात्म करने के उद्देश्य से काम कर रहा हो, उसे किसी कानूनी दायरे में बांधकर नहीं देखा जा सकता।
आरएसएस के पक्ष को मुख्य रूप से इन तर्कों के जरिए समझा जा सकता है:
- संस्था बनाम समाज: आरएसएस खुद को समाज से अलग कोई ‘संस्था’ (Institution) नहीं मानता। संघ का मानना है कि वह समाज के भीतर ही काम करने वाला “समाज का संगठन” है।
- सद्भावना और सेवा का आधार: संघ के लाखों स्वयंसेवक देश में आपदाओं, शिक्षा और सामाजिक सुधार के कार्यों में बिना किसी सरकारी या पंजीकृत दर्जे के निस्वार्थ भाव से जुटते हैं। इसके लिए किसी सरकारी कागजात से ज्यादा जन-विश्वास की जरूरत होती है।
- लाखों शाखाओं का स्वतः स्फूर्त संचालन: देश भर में चलने वाली संघ की दैनिक शाखाएं किसी कानूनी बाध्यता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक प्रतिबद्धता से संचालित होती हैं।
गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) का ऐतिहासिक संदर्भ
यह पहली बार नहीं है जब संघ के पंजीकरण को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। इतिहास गवाह है कि जब देश के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर से प्रतिबंध हटाने के लिए लिखित संविधान और पंजीकरण की बात कही थी, तब संघ के द्वितीय सरसंघचालक ‘गुरुजी’ (एम. एस. गोलवलकर) ने भी यही रुख अपनाया था।
इतिहास का पन्ना:
गुरुजी ने उस समय भी सरकार को स्पष्ट शब्दों में कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई व्यावसायिक कंपनी या क्लब नहीं है, जिसका पंजीकरण कराया जाए। यह राष्ट्र के नागरिकों का एक सांस्कृतिक प्रवाह है। हालांकि, बाद में संघ ने अपना लिखित संविधान सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया था, जिसके आधार पर ही उस पर से प्रतिबंध हटाया गया था।
कांग्रेस के आरोपों के पीछे की राजनीति
संघ के विचारकों का आरोप है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने के कारण हताशा में ऐसे गैर-जरूरी मुद्दे उठा रही है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं या कांग्रेस वैचारिक मोर्चे पर घिरती है, वह संघ को निशाना बनाना शुरू कर देती है।
संघ का कहना है कि आयकर (Income Tax) और अन्य वित्तीय मामलों में संघ के सहयोगी संगठन (जैसे जन कल्याण न्यास आदि) पूरी तरह कानूनी नियमों का पालन करते हैं और पारदर्शी हैं। ऐसे में केवल ‘आरएसएस’ शब्द के पंजीकरण को लेकर विवाद खड़ा करना कांग्रेस की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है।