कोलकाता/ आसिम अमिताव बिस्वाल/ पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण और प्रमाणपत्रों को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एक दूरगामी फैसला सुनाया है। जस्टिस राजशेखर मंथा और जस्टिस अनुज सिंह की पीठ ने राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के कार्यकाल के दौरान लागू नियमों के तहत जारी किए गए OBC-A और OBC-B श्रेणियों के सभी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया है।
कोर्ट के इस आदेश के बाद राज्य में OBC-A और OBC-B का विभाजन पूरी तरह समाप्त हो गया है। इसके तहत जारी प्रमाणपत्र अब अपनी कानूनी वैधता खो चुके हैं और इनके धारकों को अब से ‘अनारक्षित/सामान्य’ (General) श्रेणी में माना जाएगा।
फैसले के मुख्य बिंदु
OBC-A और OBC-B वर्गीकरण समाप्त: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य में इन दो श्रेणियों की व्यवस्था अब प्रभावी नहीं है।
सामान्य श्रेणी में बदलाव: इन श्रेणियों के तहत बने प्रमाणपत्रों के धारकों को अब किसी भी सरकारी नौकरी या शैक्षणिक दाखिले में OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
भर्ती प्रक्रियाओं का रास्ता साफ: लंबे समय से अटकी पड़ी राज्य सरकार की विभिन्न भर्ती प्रक्रियाओं (Recruitment Exams) और प्रतियोगी परीक्षाओं में बना कानूनी गतिरोध अब दूर होने की उम्मीद है।
प्रमाणपत्र धारकों और नई भर्तियों पर क्या होगा असर?
- आरक्षण लाभ पर रोक: जिन अभ्यर्थियों ने पूर्व में या सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित रहने के दौरान OBC-A या OBC-B प्रमाणपत्र हासिल किए थे, वे अब आरक्षण के हकदार नहीं रहेंगे। उन्हें भविष्य में होने वाले सभी आवेदनों में ‘जनरल’ श्रेणी के अंतर्गत ही प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
पुरानी नौकरियों पर कोई प्रभाव नहीं: अदालत के पूर्व के दिशा-निर्देशों के अनुसार, जिन लोगों ने इन प्रमाणपत्रों के आधार पर पहले ही सरकारी नौकरियां प्राप्त कर ली हैं या चयन प्रक्रिया पूरी कर चुके हैं, उनकी सेवाओं पर इस फैसले का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा
अटकी भर्तियों में तेजी: विभिन्न विभागों में OBC सूचियों में अनियमितताओं के आरोपों और अदालती याचिकाओं के कारण कई भर्ती परीक्षाएं रुकी हुई थीं। वर्गीकरण और अमान्य प्रमाणपत्रों की स्थिति स्पष्ट होने के बाद भर्ती प्रक्रियाएं आगे बढ़ सकेंगी।
क्या है पूरा मामला और पृष्ठभूमि?
पश्चिम बंगाल में 2010 के बाद OBC समुदाय को दो वर्गों—OBC-A (अधिक पिछड़ा) और OBC-B (पिछड़ा)—में विभाजित किया गया था। तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान बड़े पैमाने पर इन श्रेणियों के तहत प्रमाणपत्र वितरित किए गए थे।
हालाँकि, इस पूरी प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन और बिना उचित सर्वे के जातियों को जोड़ने के गंभीर आरोप लगे। जनहित याचिकाओं में यह तर्क दिया गया था कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की अनिवार्य सलाह के बिना और राजनीतिक कारणों से कई समुदायों को इस सूची में शामिल किया गया था। इसके बाद कोर्ट ने 2010 के बाद जोड़े गए कई समुदायों की वैधता पर सवाल उठाए थे और अब नई स्थिति के तहत इन श्रेणियों के तहत जारी सभी प्रमाणपत्रों को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है।