औषधीय और सुगन्धित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का अनमोल ख़ज़ाना

औषधीय और सुगन्धित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का अनमोल ख़ज़ाना

जयपुर / गौरव कोचर 
दुनिया की लगभग 80 फ़ीसदी आबादी आज भी पारम्परिक औषधियों और चिकित्सा पद्धतियों पर निर्भर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विकासशील देशों में 70 से 95 प्रतिशत लोग प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए औषधीय और सुगन्धित पौधों  का सहारा लेते हैं। ये पौधे न केवल स्वास्थ्य का आधार हैं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरणीय सन्तुलन और आजीविका से भी गहराई से जुड़े हुए हैं।

परम्परा से आधुनिक चिकित्सा तक

इतिहास गवाह है कि आधुनिक दवाओं के कई सक्रिय तत्व सीधे तौर पर प्राकृतिक संसाधनों से निकले हैं। सिंथेटिक और आधुनिक रसायन शास्त्र की तमाम प्रगति के बावजूद औषधीय पौधे दवा, सौंदर्य प्रसाधन, खाद्य और विलासिता उद्योगों का अहम हिस्सा बने हुए हैं। दुनिया भर में इन पौधों की लगभग 50 से 70 हज़ार प्रजातियाँ अपने औषधीय गुणों और सांस्कृतिक महत्व के कारण एकत्र की जाती हैं। इनमें से करीब 1300 प्रजातियाँ CITES (लुप्तप्राय जीव एवं वनस्पति की अन्तरराष्ट्रीय व्यापार संधि) की सूची में दर्ज हैं।

संकट और चुनौतियाँ

इन पौधों का अस्तित्व गंभीर ख़तरों का सामना कर रहा है। IUCN रेड लिस्ट के अनुसार, 20 प्रतिशत से अधिक औषधीय प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं। इसके पीछे मुख्य कारण हैं:

  • अत्यधिक दोहन और अवैध व्यापार
  • प्राकृतिक आवास (habitat) का क्षरण
  • जलवायु परिवर्तन का बढ़ता दबाव

उदाहरणस्वरूप, वियतनाम में पारम्परिक औषधियों के 90 प्रतिशत घटक सीधे जंगलों से प्राप्त होते हैं। ऐसे में इन पौधों का अंधाधुंध दोहन जैव विविधता के लिए गम्भीर खतरा बन रहा है।

विश्व वन्यजीव दिवस 2026 की थीम

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए, वर्ष 2026 का विश्व वन्यजीव दिवस “औषधीय और सुगन्धित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण” थीम पर मनाया जाएगा। इस अवसर पर विश्वभर में जागरूकता अभियान, संवाद, शोध प्रस्तुतियाँ और संरक्षण आधारित कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उद्देश्य यह होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सके।

औषधीय और सुगन्धित पौधे केवल बीमारियों के इलाज का साधन नहीं हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर, पर्यावरणीय संतुलन और लाखों लोगों की आजीविका के आधार भी हैं। इनके संरक्षण और सतत उपयोग के बिना, न तो स्वास्थ्य सुरक्षा सम्भव है और न ही पारम्परिक ज्ञान की धरोहर का संरक्षण। इसलिए ज़रूरी है कि सरकारें, शोध संस्थान और स्थानीय समुदाय मिलकर इन पौधों को बचाने और इनके सतत उपयोग को बढ़ावा देने की ठोस पहल करें।

 

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