जोधपुर | 08 जुलाई, 2026 / नरेश गुनानी /अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), जोधपुर के चिकित्सकों ने चिकित्सा जगत में एक और अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है। संस्थान के बाल रोग सर्जनों और वैस्कुलर विशेषज्ञों की एक संयुक्त टीम ने एक अत्यंत जटिल, जोखिम भरी और दुर्लभ शल्य चिकित्सा को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। टीम ने एक 7 वर्षीय मासूम बच्चे के शरीर से 3.7 किलोग्राम वजन का विशालकाय कैंसरग्रस्त किडनी ट्यूमर (Wilms’ Tumor) निकालकर उसे मौत के मुंह से बाहर निकाला है।
लगभग 6 घंटे तक चली इस मैराथन सर्जरी के दौरान न सिर्फ ट्यूमर को निकाला गया, बल्कि शरीर की सबसे मुख्य रक्त वाहिनी का पुनर्गठन भी किया गया। संस्थान के इतिहास में इसे अब तक की सबसे चुनौतीपूर्ण पीडियाट्रिक कैंसर सर्जरी माना जा रहा है।
समस्या की गंभीरता: पूरे पेट में फैल चुका था ट्यूमर
पीड़ित बच्चा पिछले करीब 4 वर्षों से पेट के दाहिने हिस्से में लगातार बढ़ती हुई सूजन और दर्द से परेशान था। जब उसे एम्स जोधपुर लाया गया, तो डॉक्टरों ने उसकी स्थिति को देखते हुए तुरंत सीटी स्कैन (CT Scan) करवाया। जांच रिपोर्ट देखकर डॉक्टर भी हैरान रह गए:
- ट्यूमर का विशाल आकार: ट्यूमर का आकार लगभग 24 \times 21 \times 18 सेंटीमीटर तक पहुंच चुका था।
- अंगों का विस्थापन: इस विशालकाय ट्यूमर के भारी दबाव के कारण बच्चे का लीवर, अग्न्याशय (पैंक्रियास), आंतें और मूत्राशय अपनी सामान्य जगह से पूरी तरह खिसक चुके थे।
- दाहिनी किडनी नष्ट: ट्यूमर ने बच्चे की पूरी दाहिनी किडनी को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया था और वह पेट के अधिकांश हिस्से को घेर चुका था।
सबसे बड़ी चुनौती: मुख्य रक्त वाहिकाओं पर कब्ज़ा
इस सर्जरी में सबसे बड़ा खतरा यह था कि ट्यूमर ने शरीर की सबसे बड़ी शिरा इन्फीरियर वेना कावा (IVC)—जो शरीर के निचले हिस्सों से अशुद्ध रक्त को हृदय तक ले जाती है—उसकी दीवार के भीतर प्रवेश कर लिया था। इसके अतिरिक्त, ट्यूमर दाहिनी एड्रीनल शिरा तक फैल गया था और उसके भारी दबाव के चलते बाईं किडनी की मुख्य शिरा (लेफ्ट रीनल वेन) का रास्ता भी ब्लॉक हो गया था। ऐसे में जरा सी चूक बच्चे की जान ले सकती थी।
जटिल ऑपरेशन और ‘बोवाइन पेरिकार्डियल पैच’ का इस्तेमाल
इस असंभव सी दिखने वाली सर्जरी को मुमकिन बनाने के लिए एम्स के विभिन्न विभागों के विशेषज्ञ डॉक्टर एक साथ आए। शल्य चिकित्सा के दौरान डॉक्टरों ने बच्चे की दाहिनी किडनी और पूरी मूत्रवाहिनी (यूरेटर) को ट्यूमर के साथ सुरक्षित बाहर निकाला।
चूंकि ट्यूमर आईवीसी (IVC) की दीवार को पूरी तरह संक्रमित कर चुका था, इसलिए सर्जनों ने सूझबूझ दिखाते हुए शिरा के प्रभावित हिस्से को काट कर अलग किया। इसके बाद 6 सेंटीमीटर लंबे ‘बोवाइन पेरिकार्डियल पैच’ (Bovine Pericardial Patch) की मदद से उस मुख्य नस का सफल पुनर्निर्माण (Reconstruction) किया गया।
ऑपरेशन थिएटर में ही एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड (Endoscopic Ultrasound) के जरिए जांच की गई, जिससे यह पुष्टि हुई कि पुनर्निर्मित नस में रक्त का प्रवाह (Blood Flow) पूरी तरह सामान्य हो चुका है। बाहर निकाले जाने के बाद ट्यूमर का वास्तविक वजन 3.7 किलोग्राम और आकार 21 \times 20 सेंटीमीटर मापा गया।
इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे के ‘सुपरहीरोज’
यह सफल ऑपरेशन चिकित्सा टीम के उत्कृष्ट आपसी तालमेल और सूक्ष्म प्लानिंग का परिणाम था:
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- सर्जरी टीम का नेतृत्व: डॉ. राहुल सक्सेना (अतिरिक्त प्रोफेसर, बाल शल्य चिकित्सा विभाग)।
- सीटीवीएस टीम (रक्त वाहिका विशेषज्ञ): कार्डियोथोरेसिक एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग के डॉ. अनिरुद्ध माथुर एवं डॉ. सुरेन्द्र पटेल।
- सहयोगी डॉक्टर्स व स्टाफ: बाल शल्य चिकित्सा विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर—डॉ. जॉयल सनी व डॉ. हर्षवर्धन, तथा नर्सिंग टीम से श्री सुरेश एवं श्री नवेद।
- एनेस्थीसिया टीम: डॉ. सादिक के नेतृत्व में एनेस्थीसिया टीम ने सर्जरी और विशेषकर आईवीसी रिकंस्ट्रक्शन के नाजुक पलों में बच्चे के जीवन सूचकांकों को स्थिर बनाए रखा।
- रेडियोलॉजी टीम: डॉ. तरुणा यादव ने सर्जरी से पहले का सटीक और विस्तृत मल्टीडिसिप्लिनरी रोडमैप तैयार किया।
“यह हमारे संस्थान में बच्चों पर की गई अब तक की सबसे चुनौतीपूर्ण कैंसर सर्जरी में से एक थी। ट्यूमर का आकार बहुत बड़ा था और उसने शरीर की मुख्य रक्त वाहिका को जकड़ रखा था। ऐसी सफलता केवल बाल सर्जनों, वैस्कुलर सर्जनों, एनेस्थीसिया विशेषज्ञों, रेडियोलॉजिस्ट और नर्सिंग स्टाफ के सामूहिक और सूक्ष्म प्रयासों से ही संभव है।”
— डॉ. राहुल सक्सेना, मुख्य सर्जन
मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य (MAA) योजना से मिला ‘मुफ्त’ जीवनदान
गरीब परिवार के लिए इस प्रकार के अत्याधुनिक और बेहद महंगे इलाज का खर्च उठाना नामुमकिन था। लेकिन राहत की बात यह रही कि बच्चे का पूरा इलाज—जिसमें कीमोथेरेपी, आधुनिक सीटी स्कैन, जटिल सर्जरी, आईसीयू (ICU) का खर्च, दवाइयां और अस्पताल में भर्ती रहने का पूरा खर्च शामिल है—राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य (MAA) योजना के तहत पूरी तरह से निःशुल्क किया गया। परिवार पर एक रुपये का भी आर्थिक बोझ नहीं आया।
माता-पिता के लिए डॉक्टरों की जरूरी अपील
सर्जरी के बाद बच्चा तेजी से रिकवर कर रहा है। उसे ऑपरेशन के बाद की पहली कीमोथेरेपी (Post-operative Chemotherapy) भी सफलतापूर्वक दी जा चुकी है और वह डॉक्टरों की निगरानी में पूरी तरह स्वस्थ है।
इस कामयाबी पर बाल शल्य चिकित्सा विभागाध्यक्ष प्रो. मनीष पाठक ने पूरी टीम को बधाई दी और अभिभावकों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश जारी किया:
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- लक्षणों को न छुपाएं: बच्चों में होने वाले किडनी कैंसर (विशेषकर विल्म्स ट्यूमर) का यदि सही समय पर पता चल जाए, तो इसका 100% इलाज संभव है।
- अनदेखी न करें: यदि किसी भी बच्चे के पेट में लगातार सूजन, गांठ या असामान्य उभार दिखाई दे, तो उसे गैस या सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज न करें। तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लें।
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एम्स जोधपुर का बाल शल्य चिकित्सा विभाग बच्चों में कैंसर, जन्मजात विकृतियों, नवजात शिशुओं की जटिल सर्जरी और दूरबीन (लेप्रोस्कोपिक) विधि से विश्वस्तरीय इलाज मुहैया कराने के लिए निरंतर प्रतिबद्ध है।