लोकेंद्र सिंह शेखावत
भागलपुर, बिहार! बिहार की सियासत में ‘कानून का राज’ हमेशा से एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा रहा है, जिसने सत्ता की कुर्सियां बनाई भी हैं और हिलाई भी हैं। लेकिन हाल के दिनों में सूबे की कानून-व्यवस्था का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में अपराधियों के खिलाफ ताबड़तोड़ एनकाउंटर की नीति को अपनाया गया है। आधिकारिक मंचों से मुख्यमंत्री का यह अल्टीमेटम कि “अपराधी या तो बिहार छोड़ दें या फिर श्मशान घाट जाने के लिए तैयार रहें”, राज्य में एक नए पुलिसिया तेवर की गवाही दे रहा है। परंतु, हाल ही में भोजपुर में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने सरकार की इस ‘शूटर-नीति’ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके बाद मुख्यमंत्री की ओर से न्यायिक जांच का आदेश देना उनकी गहरी बौखलाहट और बैकफुट पर आने की स्थिति को साफ दर्शाता है।सिद्धांत बनाम हकीकत: एनकाउंटर या ‘मर्डर’?पुलिसिया मुठभेड़ों का एक तय कानूनी प्रोटोकॉल होता है—आत्मरक्षा में गोली चलाना और अपराधी को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना। मगर जब एनकाउंटर की आड़ में निर्दोष या बिना किसी गंभीर आपराधिक इतिहास वाले युवाओं की जान जाने लगे, तो ‘आत्मसमर्पण’ की कहानी सीधे तौर पर ‘मर्डर’ (हत्या) के आरोपों में तब्दील हो जाती है।भोजपुर के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुआ भरत तिवारी एनकाउंटर इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के ही वरिष्ठ नेताओं ने जब इस एनकाउंटर को ‘फर्जी’ करार देते हुए सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय से हस्तक्षेप की मांग की, तो सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ वाली छवि भरभरा कर गिर गई। जब अपनी ही पार्टी के सांसद और मंत्री पुलिस पर ‘मर्डर’ का आरोप लगाने लगें, तो मुख्यमंत्री की प्रशासनिक पकड़ और उनकी राजनीतिक बौखलाहट खुलकर सामने आ जाती है।बयानों में झलकी मुख्यमंत्री की बौखलाहट सम्राट चौधरी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बिहार में ‘बुलडोजर और बुलेट’ की राजनीति स्थापित करने के लिए आतुर दिख रहे हैं। विपक्ष की ओर से जब भी इन एनकाउंटरों की निष्पक्षता और इसमें ‘जातिगत चश्मे’ के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया, तो मुख्यमंत्री ने बेहद आक्रामक और हैरान करने वाले बयान दिए। उनका यह कहना कि “मैं तो पुलिस वालों को कहूंगा कि जाति पूछकर ही गोली चलाओ”, यह दर्शाता है कि वे विपक्ष के हमलों से इस कदर विचलित हैं कि प्रशासनिक भाषा की मर्यादा को भी भूल बैठे।यह बौखलाहट तब और स्पष्ट हो गई जब एक तरफ तो पुलिस को अपराधियों को ‘ठोकने’ की खुली छूट दी गई और दूसरी तरफ भोजपुर की घटना के तुरंत बाद चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर पटना हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज से न्यायिक जांच कराने का आनन-फानन में फैसला लेना पड़ा। यह कदम साफ करता है कि सरकार को इस बात का अहसास हो चुका है कि पुलिसिया अति-उत्साह अब उनके गले की फांस बनता जा रहा है।क्या ‘शॉर्टकट’ से सुधरेगी कानून-व्यवस्था?अखबार के पन्नों और टीवी की सुर्खियों में ताबड़तोड़ ‘हाफ’ और ‘फुल’ एनकाउंटर देखना जनता के एक वर्ग को भले ही सुकून दे, लेकिन यह न्यायपालिका और मानवाधिकारों के सिद्धांतों का मखौल उड़ाने जैसा है। अपराधियों में खौफ होना जरूरी है, लेकिन खौफ पैदा करने के चक्कर में अगर खाकी वर्दी खुद ही जज और जल्लाद बन जाए, तो लोकतंत्र ‘पुलिस स्टेट’ में तब्दील हो जाता है।मुख्य बिंदु जो वर्तमान स्थिति को बयां करते हैं। जांच का दबाव: अपनी ही सरकार के मंत्रियों और भाजपा नेताओं के भारी विरोध के कारण मुख्यमंत्री को बैकफुट पर आना पड़ा।प्रशासनिक विफलता: पुलिस को खुली छूट देने का नतीजा यह हुआ कि बिना आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग भी पुलिसिया तंत्र का शिकार होने लगे।राजनीतिक घेराबंदी: विपक्ष के साथ-साथ एनडीए के अंदरूनी घटक दल भी अब इन एनकाउंटरों की टाइमिंग और मंशा पर उंगली उठा रहे हैं।निष्कर्ष:- बिहार में एनकाउंटर की बढ़ती संख्या और उसके बाद उठते सवाल यह साबित करते हैं कि अपराधियों को सुधारने या कानून के हवाले करने की जो कहानी ‘आत्मसमर्पण’ से शुरू होनी चाहिए थी, वह अब ‘फर्जी मुठभेड़ और मर्डर’ के संगीन आरोपों के चौराहे पर खड़ी है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की बौखलाहट और उनका बार-बार बयानों को बदलना यह साफ करता है कि न्याय के स्थापित सिद्धांतों को दरकिनार कर ‘शॉर्टकट’ से सुशासन लाने की कोशिशें हमेशा आत्मघाती साबित होती हैं। अब देखना यह होगा कि यह न्यायिक जांच सच को सामने लाती है या फिर खाकी के दागों को धोने का एक और राजनीतिक उपक्रम बनकर रह जाती है।
(दैवज्ञ पं. आर के चौधरी)
उर्फ बाबा-भागलपुर
महान भविष्यवेत्ता एवं प्रखर चिन्तक