उम्र को मात देता जुनून: 79 की उम्र में घुंघरुओं की थाप, कथक में एम.ए. की परीक्षा दे रहे आचार्य पाटोदिया

योगेश शर्मा 

जयपुर। ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती’—यह कहावत तो हम सभी ने सुनी है, लेकिन इसे जीवंत कर दिखाया है जयपुर के 79 वर्षीय आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया ने। जिस उम्र में लोग विश्राम और सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं, उस उम्र में आचार्य पाटोदिया कथक के जटिल पदचापों और भाव-भंगिमाओं के साथ कला की नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं।

परीक्षा केंद्र पर आकर्षण का केंद्र बने आचार्य

​सोमवार को जयपुर के एक परीक्षा केंद्र पर उस समय अद्भुत दृश्य देखने को मिला, जब कथक की पारंपरिक वेशभूषा, चेहरे पर तेज और पैरों में घुंघरू बांधे 79 साल के एक बुजुर्ग परीक्षा देने पहुंचे। आचार्य पाटोदिया कथक में एम.ए. स्तर (निपुण पार्ट-1) की प्रायोगिक परीक्षा देकर जब बाहर आए, तो वहां मौजूद युवा परीक्षार्थी और शिक्षक उनके उत्साह और समर्पण को देखकर अभिभूत हो उठे।

कला की तीनों विधाओं में हैं पारंगत

​आचार्य पाटोदिया का व्यक्तित्व केवल नृत्य तक सीमित नहीं है। वे संगीत की तीनों विधाओं— गायन, वादन और नृत्य—में समान रूप से दक्षता रखते हैं।

  • उपलब्धि: उन्होंने कथक में ‘विशारद’ की उपाधि पहले ही प्राप्त कर ली है और अब वे ‘निपुण’ (स्नातकोत्तर स्तर) की ओर अग्रसर हैं।
  • सम्मान: कला और शिक्षा के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें महामहिम राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है।

बहुआयामी व्यक्तित्व: शिक्षाविद से आध्यात्मिक चिंतक तक

​संगीत के अलावा आचार्य पाटोदिया एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद, आध्यात्मिक चिंतक और प्रेरक वक्ता के रूप में पहचाने जाते हैं। उनके लिए कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने और स्वयं को अनुशासित रखने का एक माध्यम है। उनका मानना है कि शरीर वृद्ध हो सकता है, लेकिन आत्मा और सीखने की इच्छा को हमेशा युवा रखा जा सकता है।

विरासत में मिली प्रेरणा: दादा-पोते की बेमिसाल जोड़ी

​आचार्य पाटोदिया का यह जुनून केवल उन तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी अगली पीढ़ी को भी सींच रहा है। उनके पोते खुमान पाटोदिया ने अपने दादा की ऊर्जा से प्रभावित होकर संगीत की दुनिया में कदम रखा है।

खास बात: अक्सर घर पर दादा और पोता मिलकर रियाज (गायन-वादन का अभ्यास) करते हैं। इतना ही नहीं, दोनों परीक्षाओं में भी एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए सहभागी बनते हैं, जो आज के समय में पारिवारिक सामंजस्य की एक सुंदर मिसाल है।

 

समाज के लिए एक संदेश

​आचार्य सत्यनारायण पाटोदिया की यह उपलब्धि उन लोगों के लिए एक कड़ा जवाब है जो बढ़ती उम्र को सक्रियता में बाधक मानते हैं। सोमवार को उनके चेहरे की मुस्कान और कदमों की थिरकन ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि मन में अटूट संकल्प और जुनून हो, तो उम्र के अंक केवल एक संख्या (Number) बनकर रह जाते हैं।

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