इस्लामाबाद/लंदन: गौरव कोचर
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को कम करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ़्तों के ऐतिहासिक संघर्षविराम समझौते के बीच पाकिस्तान ने एक बड़ा राजनयिक रुख अपनाया है। पाकिस्तान के योजना एवं विकास मंत्री अहसान इकबाल ने स्पष्ट किया है कि इस शांति प्रक्रिया की सफलता तभी संभव है जब इसमें लेबनान को भी शामिल किया जाए।

‘रक्तपात के बीच बातचीत संभव नहीं’
अहसान इकबाल ने क्षेत्रीय स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा, “हम यह नहीं कर सकते कि क्षेत्र के एक हिस्से में खून बहता रहे और दूसरे हिस्से पर बातचीत होती रहे।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान का मानना है कि शांति व्यापक होनी चाहिए।
उन्होंने इसराइल को नसीहत देते हुए कहा कि उसे इस महत्वपूर्ण मोड़ पर अधिक जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए। इकबाल ने चेतावनी दी कि इसराइल को इन वार्ताओं का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और न ही “इस ऐतिहासिक मौके पर बाधा” बनना चाहिए।
पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका
पाकिस्तान वर्तमान में इस वार्ता में एक प्रमुख मध्यस्थ के रूप में उभर रहा है। मंत्री इकबाल ने कहा कि पाकिस्तान दोनों पक्षों (अमेरिका और ईरान) को एक मेज पर लाने और किसी ठोस समझौते तक पहुँचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देगा। उन्होंने आगे कहा:
”अगर दोनों पक्ष संघर्षविराम को आगे बढ़ाने और अगले दौर की बातचीत शुरू करने पर सहमत हो जाते हैं, तो पाकिस्तान इसे एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी मानेगा।”
लेबनान पर विरोधाभास: अमेरिका-इसराइल बनाम ईरान-पाकिस्तान
वर्तमान समझौते की सबसे बड़ी पेचदगी लेबनान को लेकर है। जहाँ एक ओर अमेरिका और ईरान दो हफ़्तों के युद्धविराम पर सहमत हुए हैं, वहीं लेबनान में इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच भीषण संघर्ष जारी है।
- अमेरिका और इसराइल का रुख: दोनों देशों ने संकेत दिए हैं कि वर्तमान संघर्षविराम समझौते का लेबनान से कोई सीधा संबंध नहीं है।
- ईरान और पाकिस्तान का रुख: दोनों देशों का तर्क है कि जब तक लेबनान को इस समझौते के दायरे में नहीं लाया जाता, तब तक क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती।
शांति की उम्मीद या बढ़ता गतिरोध?
मध्य पूर्व में युद्ध रोकने की यह कोशिश एक नाजुक मोड़ पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान का यह बयान न केवल ईरान के पक्ष को मजबूती देता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर भी दबाव बनाता है कि वे लेबनान में जारी हिंसा को नजरअंदाज न करें। अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिका और इसराइल पाकिस्तान के इस सुझाव को स्वीकार करते हैं या लेबनान का मोर्चा इस शांति वार्ता की राह में सबसे बड़ी रुकावट बना रहेगा।