मुख्यमंत्री के गृह जिले भरतपुर में चिकित्साकर्मी परेशान; गाइडलाइंस को ताक पर रख चहेतों को दी जा रही वीआईपी सहूलियत, जिम्मेदार मौन
योगेश शर्मा
भरतपुर। श्री जगन्नाथ पहाड़िया (एसजेपी) मेडिकल कॉलेज से संबंद्ध और भरतपुर संभाग के सबसे बड़े आरबीएम चिकित्सालय में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अस्पताल प्रशासन की नाक के नीचे नर्सिंग अधीक्षक की कथित मनमानी और पक्षपातपूर्ण कार्यशैली को लेकर नर्सिंग कर्मियों में भारी रोष व्याप्त है। मामला नर्सिंग ऑफिसर्स और ट्रॉली पूलर्स की ड्यूटी रोटेशन प्रणाली से जुड़ा है, जहाँ नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को फायदा पहुँचाने और विरोध करने वालों को प्रताड़ित करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह जिले में हो रही इस अव्यवस्था के बावजूद उच्च अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं।
नियम कायदे ताक पर: सीनियर कर रहे नाइट ड्यूटी, जूनियर्स को आराम
अस्पताल के भीतर से आ रही खबरों के मुताबिक, नर्सिंग अधीक्षक कार्यालय द्वारा लंबे समय से कर्मचारियों की ड्युटियों को लेकर खुला पक्षपात किया जा रहा है। नियमों के मुताबिक हर कर्मचारी की ड्यूटी को एक निश्चित समयावधि के बाद रोटेट (परिवर्तित) करना अनिवार्य होता है, ताकि सभी को समान रूप से दिन और रात की पारियों में काम करने का मौका मिले।
लेकिन आरबीएम चिकित्सालय में इसके उलट गंगा बह रही है। आरोप है कि नर्सिंग अधीक्षक ने अपने चहेते नर्सिंग ऑफिसर्स को नाइट ड्यूटी (रात्रिकालीन सेवा) से बचाने के लिए महीनों से उनका रोटेशन ही नहीं बदला है। स्थिति यह है कि अनुभवी और सीनियर स्टाफ रात के समय वार्डों में सेवाएं देने को मजबूर हैं, जबकि जूनियर स्टाफ को रात्रिकालीन सेवाओं से पूरी तरह बचाकर रखा जा रहा है।
टीबी चेस्ट वार्ड में संक्रमण का खतरा, मांगी राहत तो मिला ‘दबाव’
सबसे गंभीर स्थिति अस्पताल के टीबी एंड चेस्ट वार्ड की है। यह अत्यधिक संक्रमित क्षेत्र (Infectious Zone) माना जाता है। यहाँ कार्यरत नर्सिंग ऑफिसर्स और ट्रॉली पूलर्स को लगातार एक ही जगह काम करते हुए लंबा समय बीत चुका है। लंबे समय तक संक्रमित वार्ड में रहने के कारण इन कर्मचारियों में गंभीर संक्रमण का जोखिम लगातार बढ़ रहा है।
- लिखित प्रार्थना पत्र भी बेअसर: कार्मिकों ने संक्रमण के खतरे को देखते हुए नर्सिंग अधीक्षक को ड्यूटी बदलने के लिए लिखित में प्रार्थना पत्र दिया था, जिसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
- अखबारों में खबर आई, तो भड़के अधीक्षक: जब इस पूरे विवाद की खबर स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई, तो नर्सिंग अधीक्षक ने अपनी गलती सुधारने के बजाय पीड़ित अधीनस्थ कर्मचारियों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने बदले की भावना और अपनी कमियां छिपाने की मंशा से पीड़ित नर्सिंग ऑफिसर्स को ही एक नया आदेश जारी कर ड्यूटी रोस्टर हेतु दिशा-निर्देशों (गाइडलाइंस) की मांग कर डाली।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और NHM की गाइडलाइंस का उल्लंघन
नर्सिंग अधीक्षक का यह रवैया स्वास्थ्य विभाग के स्थापित नियमों के सीधे खिलाफ है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि:
- कर्मचारी सुरक्षा सर्वोपरि: संक्रमित या आइसोलेशन वार्ड में काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को संक्रमण से बचाना प्रबंधन की पहली जिम्मेदारी है।
- अनिवार्य रोटेशन: एक ही कर्मचारी को लंबे समय तक हाई-रिस्क (संक्रमित) एरिया में नहीं रखा जा सकता; उनका ड्यूटी रोटेशन अनिवार्य है।
अस्पताल के कर्मचारियों का कहना है कि नर्सिंग अधीक्षक जैसे संवेदनशील और जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति का विभाग की इन जरूरी गाइडलाइंस से अनजान होना या उन्हें नजरअंदाज करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल तक पहुंची शिकायत, निष्पक्ष जांच की मांग
नर्सिंग अधीक्षक के इस कथित अड़ियल और असंवेदनशील व्यवहार से तंग आकर आखिरकार पीड़ित कर्मचारियों ने न्याय की गुहार लगाई है। इस संबंध में एसजेपी मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य (प्रिंसिपल) डॉ. विवेक भारद्वाज को एक लिखित पत्र भेजकर पूरे मामले की विस्तृत शिकायत की गई है।
कर्मचारियों की मुख्य मांगें:
- नर्सिंग अधीक्षक के पक्षपातपूर्ण और असंवेदनशील रवैये को लेकर एक उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कमेटी गठित की जाए।
- अस्पताल में तुरंत एक पारदर्शी और रोटेशन आधारित ड्यूटी प्रणाली लागू की जाए, जिससे किसी भी कर्मचारी के साथ भेदभाव न हो और स्वास्थ्यकर्मियों को मानसिक व शारीरिक परेशानी से बचाया जा सके।
अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री के गृह जिले के इस सबसे बड़े अस्पताल में व्याप्त इस अंधेरगर्दी पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग क्या ठोस कार्रवाई करता है, या फिर पीड़ित कर्मचारी इसी तरह संक्रमण के साए में काम करने को मजबूर रहेंगे।