जोधपुर/ नरेश गुनानी/भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जोधपुर द्वारा किए जा रहे एक नए शोध में भारत के सदियों पुराने पारंपरिक जनजातीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और पर्यावरणीय संरक्षण से जोड़ने की ठोस पहल की जा रही है। संस्थान के स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भास्कर कुमार काकती के नेतृत्व में जारी यह अध्ययन यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है कि भारत के आदिवासी और ग्रामीण समाजों का पारंपरिक ज्ञान केवल एक सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि आज के गंभीर पर्यावरणीय संकटों, जलवायु परिवर्तन और आजीविका की चुनौतियों से निपटने का एक कारगर वैज्ञानिक आधार भी है।
तारों और ऋतुओं को समझने वाला जनजातीय खगोल ज्ञान
इस शोध परियोजना का एक प्रमुख स्तंभ ‘जनजातीय खगोल ज्ञान’ (ट्राइबल एस्ट्रोनॉमी) का अध्ययन है। शोधकर्ता यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि देश के विभिन्न जनजातीय समुदाय आकाश, तारों की स्थिति, मौसमी चक्रों और प्रकृति के विभिन्न बदलावों को किस प्रकार पढ़ते और समझते हैं।
इस अध्ययन के तहत विभिन्न आदिवासी समुदायों के पारंपरिक खगोलीय अवलोकनों की तुलना ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ (IKS) से की जा रही है। खगोलीय ज्ञान को व्यवस्थित और सुरक्षित रखने के उद्देश्य से विभिन्न जनजातियों में प्रचलित खगोलीय मान्यताओं एवं अवधारणाओं का एक व्यापक शब्दकोश (ग्लोसरी) भी तैयार किया गया है, जिससे भविष्य के वैज्ञानिक शोधों में इसका व्यवस्थित उपयोग संभव हो सके।
राजस्थान की पारंपरिक कृषि और ‘स्पिरिचुअल इकोलॉजी’
अध्ययन का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र राजस्थान की पारंपरिक कृषि प्रणालियों और उनसे जुड़े रीति-रिवाजों का दस्तावेजीकरण है। शोध में यह देखा जा रहा है कि खेती-किसानी से जुड़ी ये स्थानीय मान्यताएं जैव विविधता के संरक्षण और सीमित प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन में किस प्रकार योगदान देती हैं।
इसके साथ ही, शोध में ‘स्पिरिचुअल इकोलॉजी’ (आध्यात्मिक पारिस्थितिकी) की अवधारणा का भी गहराई से विश्लेषण किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि प्रकृति के साथ मनुष्य का भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव किस प्रकार उसके पर्यावरण संरक्षण संबंधी व्यवहार को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
जमीनी प्रयोग: नांदिया कलां गांव में विकसित हुई ‘नक्षत्र वाटिका’
यह शोध केवल कागजों और दस्तावेजीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे धरातल पर क्रियान्वित कर व्यावहारिक पर्यावरणीय परिणाम भी हासिल किए जा रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण राजस्थान के नांदिया कलां गांव में देखने को मिला, जहां खराब और बंजर हो चुकी सामुदायिक भूमि पर एक ‘नक्षत्र वाटिका’ विकसित की गई।
इस परियोजना में स्थानीय ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक पर्यावरणीय पारिस्थितिकीय तकनीकों का समन्वय किया गया। इसके परिणामस्वरूप:
- स्थानीय जैव विविधता को पुनर्जीवित किया गया।
- दुर्लभ औषधीय पौधों का संरक्षण संभव हुआ।
- बंजर भूमि को फिर से हरा-भरा बनाकर पारिस्थितिकी संतुलन स्थापित किया गया।
डॉ. काकती के अनुसार, नांदिया कलां के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि जब स्थानीय ग्रामीण संरक्षण प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार और संरक्षक बनते हैं, तो पर्यावरण बहाली के प्रयास अधिक टिकाऊ और प्रभावी साबित होते हैं।
पारंपरिक ज्ञान से ग्रामीण उद्यमिता और रोजगार की राह
यह शोध यह भी रेखांकित करता है कि पारंपरिक ज्ञान को ग्रामीण आबादी के लिए स्थायी आजीविका और आर्थिक अवसरों में कैसे बदला जा सकता है।
केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) की ‘एस्पायर’ (ASPIRE) योजना के अंतर्गत, डॉ. काकती आईआईटी जोधपुर के ‘लाइवलीहुड बिजनेस इनक्यूबेशन सेंटर’ के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इसके तहत:
- ग्रामीण समुदायों को कौशल विकास और उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
- स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पारंपरिक संसाधनों पर आधारित उद्यमों को सरकारी योजनाओं से जोड़ा जा रहा है।
- ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी पारंपरिक दक्षताओं को बाजार की मांग के अनुरूप तराशा जा रहा है।
प्रयोगशाला और गांव के ज्ञान का समन्वय
शोध के अगले चरण में इस पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक वैज्ञानिक विधियों के साथ एकीकृत किया जा रहा है। आईआईटी जोधपुर का यह बहुविषयक (मल्टीडिसिप्लिनरी) दृष्टिकोण इंजीनियरिंग, पर्यावरण विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और ग्रामीण विकास को एक साझा मंच पर लाता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को एक-दूसरे के विपरीत देखने के बजाय उनके साझे तत्वों को अपनाना चाहिए। जब प्रयोगशालाओं की तकनीक और गांवों का पीढ़ियों पुराना अनुभव एक साथ आते हैं, तो ऐसे पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ समाधान निकलते हैं जो सामाजिक और आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य होते हैं। यह शोध इस विचार को दृढ़ता से स्थापित करता है कि ग्रामीण और आदिवासी समुदाय मात्र विकास के लाभार्थी नहीं, बल्कि भविष्य के टिकाऊ समाधानों के प्रमुख नीति-निर्माता और साझीदार हैं।